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आरोप साबित करने में अभियोजन नाकाम, पीछा और शादी के दबाव के 7 साल पुराने मामले में कल्याण कोर्ट से आरोपी बरी
कल्याण कोर्ट ने महिला का पीछा करने और उसे पति को छोड़कर शादी के लिए दबाव डालने के आरोप से जुड़े करीब 7 साल पुराने मामले में आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष कथित घटनाओं की तारीख, समय और स्थान स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सका। उपलब्ध साक्ष्य आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

कल्याण।
करीब 7 साल पुराने महिला का पीछा करने और उसे परेशान करने के मामले में कल्याण की प्रथम वर्ग न्यायिक दंडाधिकारी अदालत ने आरोपी श्रीपाद मोहन खरे को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। शिकायतकर्ता और उसके पति की गवाही में कथित घटनाओं का स्पष्ट समय, तारीख और स्थान सामने नहीं आया। अदालत ने 24 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। यह मामला कोळसेवाडी पुलिस स्टेशन के अपराध क्रमांक 541/2018 से संबंधित था। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354-D के तहत मुकदमा चलाया गया था। मामले की सुनवाई प्रथम वर्ग न्यायिक दंडाधिकारी एस. ए. पठाण की अदालत में हुई।
क्या था आरोप?
अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ता अनुष्का अतुल वैद्य और आरोपी एक ही इमारत में रहते थे। शिकायतकर्ता आरोपी को अपना माना हुआ भाई मानती थी और दोनों परिवारों के बीच संबंध भी थे। शिकायतकर्ता के अनुसार मार्च 2018 से आरोपी उसे गलत नजर से देखने लगा था। आरोप था कि 1 मार्च 2018 से 30 अक्टूबर 2018 के बीच जब शिकायतकर्ता का पति काम के लिए बाहर जाता था, तब आरोपी उनके घर का दरवाजा खटखटाता था। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जब वह घर से काम या सब्जी खरीदने के लिए बाहर जाती थी, तो आरोपी उसका पीछा करता और उससे बात करने की कोशिश करता था। शिकायतकर्ता के अनुसार आरोपी उससे कहता था कि वह अपने पति को छोड़ दे, वह उससे शादी करेगा और नायगांव स्थित अपना कमरा उसके नाम कर देगा। इसी आधार पर 31 अक्टूबर 2018 को कोळसेवाडी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई थी।
दो गवाहों की हुई गवाही
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने शिकायतकर्ता अनुष्का वैद्य और उनके पति अतुल वैद्य की गवाही कराई। शिकायतकर्ता ने अदालत में आरोपी पर पीछा करने और शादी के लिए दबाव बनाने का आरोप दोहराया। उसने यह भी बताया कि आरोपी ने उसके पति की बाइक को नुकसान पहुंचाया था। हालांकि, जिरह के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि आरोपी लंबे समय से उसका माना हुआ भाई था और वह उसे राखी भी बांधती थी। दोनों परिवारों के बीच संबंध होने की बात भी सामने आई।
कोर्ट ने गवाही में पाई अहम कमियां
अदालत ने दोनों गवाहों के बयानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि कथित पीछा करने की घटनाओं की तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट विवरण रिकॉर्ड पर नहीं आया। शिकायतकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि उसने आरोपी के कथित व्यवहार के बारे में अपने पति को तुरंत नहीं बताया था। उसके पति ने भी जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने आरोपी को अपनी पत्नी का पीछा करते हुए खुद नहीं देखा था। उन्होंने यह भी माना कि आरोपी द्वारा शिकायतकर्ता से शादी करने की बात कहने की जानकारी उन्हें उनकी पत्नी से मिली थी। अदालत ने कहा कि अभियोजन के दोनों प्रमुख गवाहों ने आरोपी और शिकायतकर्ता के पारिवारिक संबंधों की पुष्टि की है, लेकिन कथित पीछा करने की घटनाओं का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया। अदालत ने यह भी नोट किया कि मामले में अन्य महत्वपूर्ण गवाहों और जांच अधिकारी को अभियोजन पक्ष ने अदालत में पेश नहीं किया।
आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य से आरोपी द्वारा कथित अपराध किए जाने की बात साबित नहीं होती। अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी ने शिकायतकर्ता का पीछा किया या उसकी इच्छा के विरुद्ध उससे संपर्क करने का प्रयास किया। अदालत ने 24 सितंबर 2026 को आरोपी श्रीपाद मोहन खरे को धारा 248(1) सीआरपीसी के तहत आईपीसी की धारा 354-D के आरोप से बरी कर दिया। कोर्ट ने आरोपी का जमानत बंधपत्र रद्द करते हुए सीआरपीसी की धारा 437-A के तहत 15,000 रुपये का बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया।
