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19 साल पुराने मारपीट केस में आरोपी बरी, शिकायतकर्ता समेत गवाह कोर्ट में नहीं हुए पेश; सिर्फ समन्स अधिकारी की गवाही
कल्याण कोर्ट ने 19 साल पुराने मारपीट और धमकी के मामले में आरोपी जयेश खंडेराव माजिवडे को बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और अन्य महत्वपूर्ण गवाहों के कोर्ट में पेश नहीं होने के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका। कुछ गवाहों की मृत्यु हो चुकी थी, जबकि अन्य अपने पते पर नहीं मिले। ऐसे में अभियोजन की ओर से केवल समन्स बजाने वाले अधिकारी की गवाही दर्ज की गई, जो आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

कल्याण कोर्ट ने 19 साल पुराने मारपीट और आपराधिक धमकी के मामले में आरोपी जयेश खंडेराव माजिवडे को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 324, 323 और 506 के तहत लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। मामले में शिकायतकर्ता और अन्य महत्वपूर्ण गवाह अदालत में पेश नहीं हुए, जबकि कुछ गवाहों की मृत्यु हो चुकी थी और अन्य अपने पते पर नहीं मिले। यह फैसला 24 सितंबर 2026 को प्रथमवर्ग न्यायदंडाधिकारी, छठे न्यायालय, कल्याण की पीठासीन अधिकारी श्रीमती के.एस. कातकाडे ने नियमित फौजदारी खटला क्रमांक 617/2007 में सुनाया। मामला 21 नवंबर 2007 का है। अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता सुभाष परशुराम वाघे जांभुळगाव आदिवासीवाड़ी, कल्याण में रहते थे। घटना वाले दिन दोपहर करीब 2 बजे वह किराना दुकान पर गए थे। आरोप था कि वहां आरोपी जयेश माजिवडे आया और शिकायतकर्ता से गुटखा लेने के लिए कहने लगा। शिकायतकर्ता ने इससे इनकार किया तो आरोपी नाराज हो गया।
अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को मारपीट की धमकी दी और पास में पड़ा ईंट का टुकड़ा उठाकर उनके सिर पर मार दिया। इससे उनके सिर से खून निकलने लगा और वह नीचे गिर गए। आरोप यह भी था कि इसके बाद आरोपी ने हाथ-मुक्कों से मारपीट की और शिकायतकर्ता को धमकी दी। शिकायत के आधार पर कल्याण तालुका पुलिस स्टेशन में अपराध क्रमांक 192/2007 दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 324, 323 और 506 के तहत चार्जशीट दाखिल की। आरोपी को 12 दिसंबर 2007 को गिरफ्तार किया गया और 13 दिसंबर 2007 को जमानत पर रिहा कर दिया गया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों को अदालत में बुलाने के लिए कई बार समन्स जारी किए। हालांकि, महत्वपूर्ण गवाह अदालत में उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद अभियोजन पक्ष ने समन्स बजाने वाले अधिकारी एम.एन. शाह को गवाह के रूप में पेश किया।
एम.एन. शाह ने अपनी गवाही में बताया कि वह डोंबिवली पुलिस स्टेशन में समन्स और वारंट की तामील का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि शिकायतकर्ता और कुछ अन्य गवाहों के पते पर समन्स की तामील के लिए जाने पर जानकारी मिली कि उनमें से कुछ की मृत्यु हो चुकी है। एक अन्य गवाह को समन्स की तामील होने के बावजूद वह अदालत में गवाही देने नहीं आया। बाकी गवाह अपने दिए गए पते पर नहीं मिले और आसपास पूछताछ करने के बाद भी उनके संबंध में कोई उपयोगी जानकारी नहीं मिल सकी। अदालत ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और पर्याप्त साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं आया है। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई एकमात्र गवाही से कथित मारपीट, चोट पहुंचाने और आपराधिक धमकी के आरोपों के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। इसलिए आरोपी को CrPC की धारा 248(1) के तहत IPC की धारा 324, 323 और 506 के आरोपों से निर्दोष मुक्त कर दिया गया।
अदालत ने आरोपी और जमानदार के बंधपत्र रद्द कर दिए। साथ ही, उच्च न्यायालय में अपील होने की स्थिति में अदालत के समक्ष उपस्थित रहने के लिए आरोपी को CrPC की धारा 437-A के तहत जमानत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। फैसला 24 सितंबर 2026 को खुले न्यायालय में सुनाया गया।
