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20 साल पुराने नकली CD-DVD कॉपीराइट मामले में कल्याण कोर्ट ने 2 आरोपियों को किया बरी, गवाहों के पेश न होने से अभियोजन का केस कमजोर
कल्याण कोर्ट ने 20 साल पुराने नकली CD-DVD कॉपीराइट मामले में दो आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता के उलट-परीक्षण के लिए पेश न होने और अहम गवाहों की गवाही नहीं होने से अभियोजन आरोप साबित नहीं कर सका।

कल्याण कोर्ट ने करीब 20 साल पुराने नकली CD-DVD रखने और बेचने के कथित कॉपीराइट उल्लंघन मामले में दो आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ कॉपीराइट अधिनियम की धारा 51, 52-A और 63 के तहत लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। मामले में शिकायतकर्ता अपनी मुख्य गवाही के बाद उलट-परीक्षण के लिए अदालत में पेश नहीं हुआ, जबकि स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी भी कोर्ट के सामने पेश नहीं किए जा सके। यह फैसला 24 सितंबर 2026 को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट, न्यायालय क्रमांक 3, कल्याण के पीठासीन अधिकारी निलेश प्रभाकर वासाडे ने नियमित फौजदारी खटला क्रमांक 433/2005 में सुनाया। मामला मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक II-52/2005 से जुड़ा था। आरोपी सचिन चंद्रकांत प्रधान और संजय धरमदेव जैस्वाल दोनों डोंबिवली पश्चिम के कोपर रोड इलाके के रहने वाले बताए गए हैं।
मामला 24 अगस्त 2005 का है। अभियोजन के अनुसार, उस दिन दोपहर करीब 3:50 बजे डोंबिवली पूर्व के गांधीनगर चौक, रिक्शा स्टैंड के पास लक्ष्मण अपार्टमेंट स्थित स्वस्तिक VCD सेंटर में कथित कॉपीराइट उल्लंघन पाया गया था। शिकायतकर्ता अमेय दिवाकर मयेकर मुंबई में B4U कॉपीराइट ऑफिसर के तौर पर काम करते थे।
अभियोजन का आरोप था कि संजय धरमदेव जैस्वाल उक्त दुकान का मालिक था, जबकि सचिन चंद्रकांत प्रधान वहां कर्मचारी के रूप में काम करता था। आरोप था कि दुकान में हिंदी और मराठी फिल्मों की बिना अनुमति तैयार की गई नकली CD और DVD बिक्री तथा किराये पर देने के लिए रखी गई थीं। शिकायतकर्ता की शिकायत के आधार पर मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में अपराध दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के दौरान शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए। कथित तौर पर दो पंचों की मौजूदगी में CD और DVD जब्त की गईं। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 51, 52-A और 63 के तहत चार्जशीट दाखिल की। मुकदमे के दौरान शिकायतकर्ता अमेय मयेकर मुख्य गवाही के लिए अदालत में उपस्थित हुआ। हालांकि, वह बाद में उलट-परीक्षण के लिए कोर्ट में पेश नहीं हुआ। अदालत ने इस कारण उसकी गवाही को रद्द कर दिया। इसके बाद अभियोजन के पास आरोपियों के खिलाफ सीधे आरोप साबित करने वाला महत्वपूर्ण साक्ष्य नहीं बचा। अभियोजन पक्ष ने स्वतंत्र गवाहों, पंच गवाहों और जांच अधिकारी को भी अदालत में पेश करने का प्रयास किया। अदालत ने इन गवाहों को उपस्थित कराने के लिए कई बार समन्स जारी किए, लेकिन वे कोर्ट में नहीं आए। अंततः समन्स की तामील करने वाले पुलिस कर्मचारी आनंद दगडू बाशिंगे को अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में पेश किया गया।
बाशिंगे ने अदालत में बताया कि वह मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में समन्स की तामील का काम करते हैं। वह मामले के गवाहों को समन्स देने के लिए उनके बताए गए पतों पर गए, लेकिन संबंधित गवाह वहां नहीं मिले। उन्होंने इस संबंध में समन्स रिपोर्ट भी अदालत में पेश की। अदालत ने कहा कि समन्स अधिकारी की गवाही से यह साबित नहीं होता कि आरोपियों ने कॉपीराइट का उल्लंघन करते हुए नकली CD और DVD अपने कब्जे में रखी थीं या उन्हें बेचने के लिए रखा था। कोर्ट ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष की ओर से ऐसा कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं आया, जिससे आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित हो सकें। अदालत ने इसलिए दोनों आरोपियों को CrPC की धारा 248(1) के तहत कॉपीराइट अधिनियम की धारा 51, 52-A और 63 के आरोपों से बरी कर दिया। दोनों आरोपियों और उनके जमानदारों के बंधपत्र तथा जमानत रद्द कर दिए गए। कोर्ट ने जब्त की गई करीब 4,600 रुपये मूल्य की CD को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नष्ट करने का आदेश भी दिया। साथ ही न्यायनिर्णय की एक प्रति ठाणे के जिलाधिकारी को शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराने के लिए भेजने का निर्देश दिया।
