law-order
संज्ञान के समय आरोपी को सुनना जरूरी नहीं, BNSS धारा 223 पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 223 के तहत संज्ञान लेते समय आरोपी को सुनवाई का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने विरोध याचिका (Protest Petition) के आधार पर संज्ञान लेने की स्थिति को लेकर भी कानूनी स्थिति साफ की है।

नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी मामले में मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) लागू होने के बाद न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए प्रथमदृष्टया अपराध बनना पाया और आरोपी के खिलाफ संज्ञान लिया, तो आरोपी को पहले सुनवाई का अवसर देना जरूरी है। केवल इस आधार पर कि शिकायत BNSS लागू होने से पहले दाखिल की गई थी, आरोपी को सुनवाई के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पुलिस द्वारा दाखिल क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका पर लंबे समय तक कार्यवाही लंबित रही। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के उस आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें प्रथमदृष्टया अपराध बनना पाया गया और आरोपी के खिलाफ प्रक्रिया जारी करने का निर्देश दिया गया था।
मामले में 7 जून 2022 को एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने 6 अगस्त 2022 को क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की। इसके बाद 14 अक्टूबर 2022 को विरोध याचिका दाखिल की गई। कोर्ट ने 29 नवंबर 2022 को सीआरपीसी की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का आदेश दिया, जिसे अब BNSS की धारा 193(9) के तहत जांच से संबंधित प्रावधान माना जाता है। इसके बाद पुलिस ने 14 फरवरी 2023 को दूसरी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और 28 अप्रैल 2023 को एक और विरोध याचिका दाखिल हुई। शिकायत को 11 अक्टूबर 2023 को कोर्ट के रिकॉर्ड पर लिया गया। 6 मार्च 2024 को शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए गए। हालांकि, मामले में 3 जून 2026 तक कोई अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं हुआ। इसी तारीख को आजमगढ़ के एससी/एसटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश ने प्रथमदृष्टया अपराध बनना पाया और आरोपियों के खिलाफ प्रक्रिया जारी की।
आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि 3 जून 2026 का आदेश ही वह आदेश था, जिसके जरिए वास्तव में संज्ञान लिया गया। यह आदेश BNSS के 1 जुलाई 2024 से लागू होने के बाद पारित हुआ था। इसलिए BNSS की धारा 223 के प्रावधान के तहत संज्ञान लेने से पहले आरोपियों को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद वसीम कादरी ने तर्क दिया कि संज्ञान लेने के लिए किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती। उनका कहना था कि जैसे ही शिकायत कोर्ट के रिकॉर्ड पर स्वीकार की गई, उसी समय संज्ञान लिया जा चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने CREF Finance Ltd. बनाम Shree Shanthi Homes (P) Ltd. मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि संज्ञान अपराध का लिया जाता है, आरोपी का नहीं। जब कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि मामले में अपराध का खुलासा होता है और वह आगे कार्यवाही करता है, तो यह माना जा सकता है कि संज्ञान लिया गया है। पीठ ने Zunaid बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में बताए गए सिद्धांतों पर भी गौर किया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद मजिस्ट्रेट के पास कई विकल्प होते हैं। वह कार्रवाई बंद कर सकता है, पुलिस की राय से असहमत होकर संज्ञान ले सकता है और प्रक्रिया जारी कर सकता है, अथवा मूल शिकायत पर संज्ञान लेकर शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने Parvinder Singh बनाम Directorate of Enforcement के फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में कहा गया था कि BNSS के तहत संज्ञान लेना न्यायिक विवेक के इस्तेमाल के समान है और जब तक न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया जाता, तब तक जांच या पूछताछ को संज्ञान की कार्यवाही नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि यह सिद्धांत सीआरपीसी के तहत भी लागू होता है। हालांकि BNSS में एक अतिरिक्त सुरक्षा दी गई है, जिसके तहत न्यायिक विवेक का इस्तेमाल कर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर विशेष न्यायाधीश के 3 जून 2026 के आदेश को उस सीमा तक बरकरार नहीं रखा, जिसमें प्रथमदृष्टया अपराध पाए जाने और प्रक्रिया जारी करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संज्ञान कब लिया गया, यह तय करने के लिए केवल शिकायत दाखिल होने की तारीख नहीं, बल्कि यह देखना जरूरी है कि कोर्ट ने वास्तव में कब न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया।
