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मानवीय आधार पर समय से पहले जन्मी बच्ची की देखभाल के लिए NDPS आरोपी महिला को 8 महीने की अंतरिम जमानत: बॉम्बे HC
बॉम्बे हाईकोर्ट ने NDPS मामले में आरोपी पूजा लाल को मानवीय आधार पर 8 महीने की अंतरिम जमानत दी है। जस्टिस मिलिंद जाधव ने गौर किया कि आरोपी महिला ने 9 जनवरी 2026 को समय से पहले बच्ची को जन्म दिया था और नवजात की हालत गंभीर बनी हुई है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट के तहत दर्ज मामले में आरोपी महिला पूजा लाल को आठ महीने की अंतरिम जमानत दी है। कोर्ट ने यह राहत मानवीय आधार पर दी, क्योंकि आरोपी महिला की समय से पहले जन्मी आठ महीने की बच्ची की हालत नाजुक बताई गई है। जस्टिस मिलिंद जाधव ने मामले की सुनवाई करते हुए बच्ची की स्थिति और मां की आवश्यकता को ध्यान में रखा। मामले में आरोपी महिला ने अंतरिम जमानत की मांग करते हुए अदालत के समक्ष अपनी बच्ची की स्वास्थ्य स्थिति का हवाला दिया था। कोर्ट के सामने रखा गया कि पूजा लाल ने 9 जनवरी 2026 को समय से पहले एक बच्ची को जन्म दिया था। बच्ची अभी बेहद कम उम्र की है और उसकी स्वास्थ्य स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। जस्टिस मिलिंद जाधव ने मामले में उपलब्ध परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि बच्ची की स्थिति को देखते हुए इस समय मां की देखभाल और मौजूदगी महत्वपूर्ण है। इसी मानवीय परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरोपी को आठ महीने की अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया।
यह मामला नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटांसेज एक्ट यानी NDPS एक्ट के तहत दर्ज किया गया है। NDPS एक्ट में अपराधों की गंभीरता को देखते हुए जमानत के लिए कड़े प्रावधान हैं। हालांकि, अदालत ने मौजूदा मामले में आरोपी की बच्ची की स्वास्थ्य स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों को अलग से ध्यान में रखा। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि बच्ची का जन्म समय से पहले हुआ था और वह अभी मां की देखभाल की जरूरत वाली अवस्था में है। कोर्ट ने माना कि ऐसी परिस्थिति में आरोपी महिला को सीमित अवधि के लिए राहत देना उचित है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूजा लाल को आठ महीने की अंतरिम जमानत प्रदान की है। यह राहत स्थायी जमानत नहीं है और निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद मामले की स्थिति के अनुसार आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस मिलिंद जाधव ने की। कोर्ट का यह आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि कठोर विशेष कानून के तहत दर्ज मामले में भी अदालतें आरोपी की गंभीर पारिवारिक और मानवीय परिस्थितियों को जमानत के प्रश्न पर ध्यान में रख सकती हैं।
