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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Chief Justice-केंद्रित प्रशासन पर जताई चिंता, कहा- फैसलों में सभी जजों की भागीदारी जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट के Chief Justice-केंद्रित प्रशासनिक मॉडल में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक फैसलों में सभी जजों की अधिक सहभागी भूमिका, स्पष्ट मानदंड और संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। कोर्ट ने हाईकोर्ट की 84 समितियों में प्रशासनिक जिम्मेदारियों के कुछ वरिष्ठ जजों तक सीमित रहने पर भी चिंता जताई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट के प्रशासन में Chief Justice-केंद्रित व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन में मजबूत नेतृत्व जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहयोगात्मक, सहभागी और परामर्शात्मक दृष्टिकोण भी होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था में संस्थागत संतुलन और जवाबदेही को मजबूत करने की आवश्यकता है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में हाईकोर्ट के स्तर पर जजों के बीच न्यायिक कार्य के आवंटन जैसे प्रशासनिक मुद्दों पर पर्याप्त “सचेत और सहभागी संवाद” की गुंजाइश नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कार्य आवंटन को जजों के प्रदर्शन से जोड़ने वाली कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। इसके अलावा, जजों को अगले स्तर पर पदोन्नति या elevation के लिए विचार किए जाने के संबंध में “स्पष्ट, संहिताबद्ध और अधिसूचित मानदंड” भी निर्धारित नहीं हैं।
प्रशासनिक फैसलों में जवाबदेही पर सवाल
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक पक्ष पर लिए जाने वाले फैसलों की जवाबदेही को लेकर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर लिए गए निर्णय किसी स्वतंत्र एजेंसी के ऑडिट के अधीन नहीं होते। ऐसे में यदि किसी मामले में पक्षपात, भेदभाव या किसी अन्य बाहरी प्रभाव की पुष्टि होती है, तो जवाबदेही तय करने की प्रभावी व्यवस्था का अभाव रहता है। कोर्ट ने कहा कि इन सभी परिस्थितियों का सामूहिक प्रभाव उन परिस्थितियों को कमजोर करता है, जिनमें न्यायिक चरित्र का निर्माण होता है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अनियंत्रित और स्पष्ट दिशा-निर्देशों से मुक्त विवेकाधिकार का न्याय प्रशासन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
Chief Justice-केंद्रित मॉडल में बदलाव की जरूरत
कोर्ट ने इस पृष्ठभूमि में कहा कि हाईकोर्ट की मौजूदा Chief Justice-केंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था में “recalibration” यानी पुनर्संतुलन की आवश्यकता है। कोर्ट के अनुसार, प्रशासन को अधिक विचार-विमर्श आधारित और संस्थागत रूप से संतुलित बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक मामलों में puisne judges यानी Chief Justice के अलावा अन्य जजों की सीमित भूमिका सहभागी निर्णय लेने और संस्थागत जवाबदेही पर आधारित व्यापक प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि Chief Justice-केंद्रित मॉडल का अर्थ केवल एक व्यक्ति के हाथों में प्रशासनिक अधिकारों का केंद्रीकरण नहीं होना चाहिए। मजबूत नेतृत्व के साथ जजों के बीच सहयोग, परामर्श और संस्थागत भागीदारी भी व्यवस्था का हिस्सा होनी चाहिए।
हाईकोर्ट में 84 समितियों के कामकाज पर भी चर्चा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रशासनिक कामकाज के लिए गठित समितियों की मौजूदा व्यवस्था का भी परीक्षण किया। कोर्ट ने बताया कि हाईकोर्ट का प्रशासनिक काम वर्तमान में 84 समितियों के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। कोर्ट के अनुसार, पिछले साढ़े तीन वर्षों में इन समितियों में से अधिकांश की अध्यक्षता केवल 2-3 वरिष्ठ जजों ने की। ये जज प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालने के साथ-साथ व्यस्त न्यायिक रोस्टर के तहत न्यायिक कार्य भी कर रहे थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी चिंता केवल समितियों की संख्या को लेकर नहीं है। मुख्य चिंता यह है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रशासनिक जिम्मेदारियां कुछ ही वरिष्ठ जजों के बीच केंद्रित हो गई हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक संस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त विचार-विमर्श, सहभागिता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो। कोर्ट ने इसी दिशा में Chief Justice-केंद्रित मॉडल को अधिक deliberative और institutionally balanced बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
