सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े मामलों में वैधानिक नोटिस की सेवा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत मांग नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट से आरोपी के सही पते पर भेजा गया है, तो नोटिस की सेवा की एक rebuttable presumption यानी खंडनीय धारणा बनती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में नोटिस प्राप्त करने वाले व्यक्ति के परिवार के किसी सदस्य को नोटिस मिलने से उसकी वैध सेवा प्रभावित नहीं होती। इसके बाद नोटिस की जानकारी नहीं होने या सेवा में कमी होने का दावा करने का भार संबंधित drawer यानी चेक जारी करने वाले व्यक्ति पर होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सही पते पर नोटिस भेजे जाने के साथ ही कानून के तहत “giving of notice” की आवश्यकता पूरी हो जाती है। इसके बाद चेक जारी करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसे नोटिस के अपने पते पर पहुंचने की जानकारी नहीं थी, नोटिस गलत पते पर भेजा गया था या डाक विभाग की ओर से की गई endorsement गलत थी। कोर्ट ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि नोटिस व्यक्तिगत रूप से चेक जारी करने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं हुआ। उसे इस धारणा को खारिज करने के लिए ठोस आधार प्रस्तुत करना होगा। यह मामला Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत चेक बाउंस से संबंधित था। धारा 138 के तहत चेक के अनादर के बाद निर्धारित शर्तों के अनुसार भुगतान की मांग करते हुए कानूनी नोटिस भेजना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नोटिस की सेवा के संबंध में यह महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया नोटिस कानून की नजर में सेवा माना जा सकता है, भले ही उसे संबंधित व्यक्ति के बजाय उसके परिवार के किसी सदस्य ने प्राप्त किया हो। इस तरह कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चेक बाउंस मामलों में नोटिस की वैधता केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि नोटिस स्वयं drawer ने हाथ में लेकर प्राप्त नहीं किया था। यदि नोटिस सही पते पर भेजा गया है, तो सेवा की धारणा लागू होगी और उसे rebut करने की जिम्मेदारी drawer की होगी।