law-order
WhatsApp पर आपत्तिजनक फोटो प्रसारित करना ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ में आ सकता है, SC/ST एक्ट लागू होगा: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि WhatsApp पर आपत्तिजनक फोटो या वीडियो को अन्य लोगों तक प्रसारित करना परिस्थितियों के आधार पर ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ में किया गया कृत्य माना जा सकता है। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामले में SC/ST एक्ट की संबंधित धाराएं लागू हो सकती हैं और आरोपी निखिल मधुकर थेपले की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने कहा है कि WhatsApp के जरिए किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला के आपत्तिजनक फोटो या वीडियो अन्य लोगों तक पहुंचाना परिस्थितियों के आधार पर ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ में किया गया कृत्य माना जा सकता है। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की संबंधित धाराएं प्रथम दृष्टया लागू हो सकती हैं। अदालत ने आरोपी निखिल मधुकर थेपले की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। मामले में जस्टिस वाई. जी. खोबरागड़े ने सुनवाई की। न्यायिक रिकॉर्ड में यह मामला Criminal Appeal No. 127 of 2026 के रूप में दर्ज है।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला SC/ST समुदाय से संबंधित है। आरोप है कि आरोपी ने महिला से शारीरिक संबंध बनाने की मांग की थी। महिला के इनकार करने के बाद आरोपी ने कथित तौर पर उसके आपत्तिजनक और नग्न फोटो तथा वीडियो तैयार किए। इसके बाद इन फोटो और वीडियो को एक अलग मोबाइल नंबर के माध्यम से WhatsApp पर महिला के पति, ननद और अन्य रिश्तेदारों को भेजा गया। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 77 और 78, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(E) और 67 तथा SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r), 3(1)(w)(ii) और 3(2)(va) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
WhatsApp पर प्रसार को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवालों में से एक यह था कि WhatsApp के जरिए आपत्तिजनक सामग्री कुछ व्यक्तियों तक भेजे जाने को SC/ST एक्ट में इस्तेमाल किए गए ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ की शर्त के संदर्भ में कैसे देखा जाए। अदालत ने मामले की परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री को देखते हुए प्रथम दृष्टया माना कि संबंधित प्रावधानों के आवश्यक तत्व मौजूद हैं। इस संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि अलग-अलग मामलों में अदालतों ने WhatsApp की प्रकृति और ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ की अवधारणा को परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग तरीके से देखा है। वर्ष 2020 में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने निजी WhatsApp संदेशों के एक मामले में कहा था कि दो व्यक्तियों के निजी अकाउंट के बीच भेजे गए संदेश अपने आप में सार्वजनिक स्थान नहीं बन जाते। अदालत ने यह भी कहा था कि WhatsApp ग्रुप में भेजे गए संदेश की स्थिति अलग हो सकती है, क्योंकि ग्रुप के सदस्य उस सामग्री तक पहुंच रखते हैं। वहीं, 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने WhatsApp Status से जुड़े SC/ST एक्ट के मामले में FIR रद्द करने से इनकार किया था। उस मामले में कोर्ट ने कहा था कि WhatsApp Status का उद्देश्य अपने संपर्कों तक सामग्री पहुंचाना है और सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करते समय व्यक्ति को जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ की बहस
हाल के समय में अदालतों के सामने SC/ST एक्ट में ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ की अवधारणा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किस तरह लागू होगी, यह सवाल लगातार सामने आया है। 30 सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी सोशल मीडिया पर जातिसूचक अपशब्दों के संदर्भ में कहा कि ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ की अवधारणा केवल भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं है और डिजिटल क्षेत्र तक भी इसका विस्तार हो सकता है। हालांकि, हर WhatsApp संदेश या सोशल मीडिया पोस्ट स्वतः SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाता। सामग्री की प्रकृति, उसे किस व्यक्ति या समूह तक पहुंचाया गया, घटना की परिस्थितियां और संबंधित कानूनी प्रावधानों की आवश्यक शर्तें महत्वपूर्ण होती हैं। उदाहरण के लिए, सितंबर 2026 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अलग मामले में WhatsApp Status को IPC की धारा 505(2) के तहत सार्वजनिक मंच पर ‘publication or circulation’ मानने से इनकार करते हुए FIR रद्द की थी।
आरोपी को नहीं मिली अग्रिम जमानत
निखिल मधुकर थेपले के मामले में हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में अप्रैल 2026 की कार्यवाही भी दर्ज है, जिसमें अदालत ने पीड़िता की ओर से कानूनी सहायता के लिए वकील नियुक्त करने का निर्देश दिया था और पहले दिए गए अंतरिम आदेश को अगली सुनवाई तक जारी रखा था। इस तरह, बॉम्बे हाईकोर्ट की यह कार्यवाही डिजिटल माध्यम से आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार और SC/ST एक्ट में ‘Public View (सार्वजनिक दृष्टि)’ की कानूनी अवधारणा के बीच संबंध को लेकर महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसका प्रभाव प्रत्येक मामले के तथ्यों और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा।
