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रोक के दौरान मिली बोली (Bid) से नहीं हो सकती संपत्ति की वैध बिक्री, 30 दिन की शर्त जरूरी: SC

सुप्रीम कोर्ट ने SARFAESI Act (वित्तीय परिसंपत्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम) के तहत ऊटी के ‘द फर्नहिल’ रिजॉर्ट की नीलामी रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि रोक आदेश के दौरान प्राप्त बोलियों के आधार पर बिक्री वैध नहीं हो सकती और संपत्ति की बिक्री से पहले कानून में निर्धारित 30 दिन की अनिवार्य अवधि का पालन भी जरूरी है।

Sonali06 अक्टू. 2026, 07:25 PM IST
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रोक के दौरान मिली बोली (Bid) से नहीं हो सकती संपत्ति की वैध बिक्री, 30 दिन की शर्त जरूरी: SC

नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने SARFAESI Act (वित्तीय परिसंपत्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002) के तहत की गई नीलामी को रद्द करते हुए कहा है कि किसी संपत्ति की बिक्री पर रोक के आदेश के बावजूद प्राप्त की गई बोली वैध बिक्री का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया और समय-सीमा का पालन किए बिना संपत्ति की बिक्री को वैध नहीं माना जा सकता।

यह मामला Sterling Holiday Resorts Limited (स्टर्लिंग हॉलिडे रिजॉर्ट्स लिमिटेड) के Ooty (ऊटी) स्थित ‘The Fernhill’ Resort (द फर्नहिल रिजॉर्ट) से जुड़ा था। कंपनी ने Industrial Finance Corporation of India Limited (इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और Tourism Finance Corporation of India Limited (टूरिज्म फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) से कर्ज लिया था। इस कर्ज के बदले ऊटी स्थित रिजॉर्ट की संपत्ति गिरवी रखी गई थी। कर्ज की अदायगी में डिफॉल्ट (चूक) होने के बाद Industrial Finance Corporation of India Limited (IFCI) ने SARFAESI Act के तहत कार्रवाई शुरू की और संपत्ति की नीलामी के लिए नोटिस जारी किया। नीलामी में संपत्ति की Reserve Price (आरक्षित कीमत) 20 करोड़ रुपये तय की गई थी।

Debt Recovery Appellate Tribunal ने लगाई थी रोक

नीलामी प्रक्रिया के दौरान Debt Recovery Appellate Tribunal यानी DRAT (ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण) ने IFCI को SARFAESI Act के तहत आगे की कार्रवाई करने से रोक दिया था। इसके लिए उधारकर्ता को 1 करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया था। उधारकर्ता ने यह राशि जमा कर दी थी। इसके बावजूद IFCI ने नीलामी में Bids (बोलियां) और Earnest Money (बयाना राशि) स्वीकार कर ली। हालांकि उस समय बोलियां खोली नहीं गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बोली और बयाना राशि स्वीकार करना भी बिक्री प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए जब रोक आदेश लागू था, उस दौरान प्राप्त की गई बोलियों को बाद में आए किसी आदेश के आधार पर वैध नहीं बनाया जा सकता।

करीब 17 महीने बाद खोली गई बोलियां

बाद में मामले में Madras High Court (मद्रास हाईकोर्ट) के समक्ष कार्यवाही हुई। हाईकोर्ट के आदेश के बाद IFCI ने पहले प्राप्त बोलियों को खोल दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस दौरान SARFAESI Security Interest (Enforcement) Rules, 2002 यानी प्रतिभूति हित (प्रवर्तन) नियम, 2002 के Rule 9(1) के तहत निर्धारित 30 दिन की अनिवार्य अवधि का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि संपत्ति की बिक्री से पहले उधारकर्ता को कानून के अनुसार निर्धारित समय दिया जाना जरूरी है। केवल पहले प्राप्त बोलियों को लंबे समय बाद खोलकर बिक्री पूरी नहीं की जा सकती।

उधारकर्ता को नीलामी दोबारा शुरू होने की जानकारी नहीं दी गई

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि नीलामी प्रक्रिया लंबे समय तक रुकी रही और करीब 17 महीने बाद बोलियां खोली गईं। लेकिन उधारकर्ता को यह सूचना नहीं दी गई कि नीलामी प्रक्रिया फिर से शुरू की जा रही है। कोर्ट ने कहा कि SARFAESI Rules (सरफेसी नियम) के Rule 8 और Rule 9 में दिए गए प्रावधान Secured Creditor (सुरक्षित ऋणदाता) की शक्तियों पर लागू अनिवार्य सुरक्षा उपाय हैं। इनका पालन किए बिना बिक्री प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

Sale Certificate भी दूसरे पक्ष के नाम जारी हुआ

मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी खामी सामने आई। नीलामी में Rukmani Khemchand (रुक्मणी खेमचंद) ने अपने व्यक्तिगत नाम से बोली लगाई थी और उन्हें Successful Bidder (सफल बोलीदाता) घोषित किया गया था। लेकिन बाद में Sale Certificate (बिक्री प्रमाणपत्र) M/s P.M. Associates (एम/एस पी.एम. एसोसिएट्स) के नाम जारी कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि P.M. Associates नाम की Partnership Firm (साझेदारी फर्म) उस समय अस्तित्व में ही नहीं थी जब नीलामी के लिए बोलियां आमंत्रित और प्राप्त की गई थीं। फर्म 12 सितंबर 2011 को अस्तित्व में आई, यानी उसी दिन जिस दिन बोलियां खोली गई थीं। कोर्ट ने कहा कि जो संस्था बोली आमंत्रित और प्राप्त किए जाने के समय अस्तित्व में ही नहीं थी, उसकी उस समय नीलामी में पात्रता का आकलन नहीं किया जा सकता था।

खरीदार को रकम वापस मिली

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि बाद में उधारकर्ता ने IFCI की पूरी देनदारी चुका दी थी। दूसरी ओर, खरीदार ने बिक्री की रकम ब्याज सहित वापस स्वीकार कर ली थी और संपत्ति का कब्जा भी उधारकर्ता के पास ही रहा। इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने Madras High Court (मद्रास हाईकोर्ट) के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें नीलामी बिक्री को बरकरार रखा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

Justice P.S. Narasimha (जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा) और Justice Alok Aradhe (जस्टिस आलोक अराधे) की पीठ ने कहा कि रोक आदेश की अवहेलना करके प्राप्त की गई बोली, अनिवार्य 30 दिन की अवधि का पालन किए बिना की गई बिक्री और ऐसे पक्ष के नाम Sale Certificate (बिक्री प्रमाणपत्र) जारी करना जिसने बोली नहीं लगाई थी और उस समय अस्तित्व में भी नहीं था—ये सभी गंभीर कानूनी खामियां हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Sterling Holiday Resorts Limited की अपील स्वीकार करते हुए नीलामी बिक्री को रद्द कर दिया। इस फैसले से स्पष्ट है कि SARFAESI Act के तहत बैंकों और वित्तीय संस्थानों को संपत्ति की नीलामी करते समय लागू न्यायिक आदेशों और Security Interest (Enforcement) Rules, 2002 (प्रतिभूति हित प्रवर्तन नियम, 2002) में निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होगा।