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डोंबिवली डॉक्टर मारपीट केस: सुप्रीम कोर्ट ने KDMC पार्षद रमेश म्हात्रे समेत 4 की जमानत रद्द की, 5 अक्टूबर तक सरेंडर का आदेश
डोंबिवली के शास्त्री नगर नगर अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ से कथित मारपीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने KDMC पार्षद रमेश म्हात्रे समेत चार आरोपियों की जमानत रद्द कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि हिंसा, धमकी या दबाव के डर में डॉक्टरों से स्वतंत्र और सही पेशेवर निर्णय लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा जमानत बहाल करने के फैसले पर भी सवाल उठाया और कहा कि अपना पहले का रुख बदलने के लिए कोई नया या बदला हुआ हालात स्पष्ट नहीं किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट और धमकी के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव के डर के बीच डॉक्टरों से स्वतंत्र और सही पेशेवर निर्णय लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा और गरिमा केवल व्यक्तिगत सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि मरीजों को उचित चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने डोंबिवली के शास्त्री नगर नगर अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर कथित हमले के मामले में कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) के पार्षद रमेश म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों को दी गई जमानत रद्द कर दी। कोर्ट ने चारों आरोपियों को 5 अक्टूबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट (विचारण अदालत) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
डॉक्टरों को हिंसा के डर में काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्पतालों और आपातकालीन परिस्थितियों में डॉक्टरों को कई बार बेहद कम समय में मरीज की स्थिति का आकलन कर महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते हैं। कई बार उनके पास पूरी जानकारी भी उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में डॉक्टर का शांत, केंद्रित और स्वतंत्र रहना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि यदि डॉक्टर शारीरिक हिंसा, धमकी या दबाव के डर में काम कर रहा हो तो उससे सही और स्वतंत्र पेशेवर निर्णय लेने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। डॉक्टरों की सुरक्षा और गरिमा व्यापक जनहित से जुड़ी है, क्योंकि चिकित्सा सेवाओं के लिए ऐसा वातावरण जरूरी है जिसमें डॉक्टर बिना भय के अपने पेशेवर निर्णय ले सकें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मरीज के इलाज को लेकर शिकायत या असंतोष कितना भी वास्तविक क्यों न हो, वह डॉक्टरों या मेडिकल स्टाफ के खिलाफ हिंसा का आधार नहीं बन सकता। डॉक्टर-मरीज का रिश्ता विश्वास, भरोसे और आश्वासन पर आधारित होता है और मरीज गंभीर परिस्थितियों में अपना जीवन डॉक्टर के भरोसे छोड़ते हैं।
गर्भवती महिला को शिफ्ट करने को लेकर हुआ था विवाद
मामला 6 जुलाई 2026 का है। अभियोजन के अनुसार डोंबिवली के शास्त्री नगर नगर अस्पताल में तीन डॉक्टरों, जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं, के साथ रमेश म्हात्रे और तीन अन्य लोगों ने कथित तौर पर मारपीट और गाली-गलौज की। बताया गया कि गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान दूसरे स्थान पर शिफ्ट करने को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ कथित मारपीट की गई। अगले दिन आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और महाराष्ट्र मेडिकेयर एक्ट (Maharashtra Medicare Service Persons and Medicare Service Institutions (Prevention of Violence and Damage or Loss to Property) Act) की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई।
मजिस्ट्रेट ने जमानत दी, हाईकोर्ट ने पहले रोक लगाई
मजिस्ट्रेट ने रमेश म्हात्रे को 14 जुलाई और तीन अन्य आरोपियों को 17 जुलाई को जमानत दे दी थी। घटना को लेकर सार्वजनिक चिंता के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया और जमानत आदेशों पर रोक लगाते हुए म्हात्रे को सरेंडर करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में हाईकोर्ट के 18 जुलाई और 7 अगस्त के आदेशों की तुलना की। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इन दोनों मौकों पर जमानत को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया। पहले हाईकोर्ट ने डॉक्टरों पर ड्यूटी के दौरान हुए कथित हमले और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए जमानत पर रोक लगाई थी। उस समय हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया (Prima Facie) हस्तक्षेप का आधार पाया था। लेकिन 7 अगस्त को हाईकोर्ट ने आरोपियों की जमानत बहाल कर दी। इस दौरान हिरासत में बिताई गई अवधि, जांच में हुई प्रगति, फॉरेंसिक जांच (Forensic Analysis) पूरी होने की संभावना और आरोपियों के महाराष्ट्र से बाहर प्रस्तावित निवास जैसे पहलुओं पर विचार किया गया।
जमानत पर रुख बदलने का ठोस कारण नहीं बताया: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपना पहले का रुख बदलने के लिए किसी ऐसे नए या बदले हुए हालात की पहचान नहीं की, जो पहले लिए गए निर्णय से हटने को उचित ठहरा सके। कोर्ट ने कहा कि केवल हिरासत में समय बीतना, जांच में प्रगति होना या फॉरेंसिक जांच पूरी होने की संभावना यह स्पष्ट नहीं करती कि पहले हाईकोर्ट के सामने महत्वपूर्ण रहे हालात अब क्यों समाप्त हो गए या उनका महत्व क्यों कम हो गया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट को यह बताना जरूरी था कि पहले जमानत पर रोक लगाने के दौरान जिन परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना गया था, उनमें बाद में ऐसा क्या बदलाव आया जिसके कारण जमानत बहाल करने का निर्णय लिया गया।
रमेश म्हात्रे के खिलाफ 18 आपराधिक मामले भी बने महत्वपूर्ण आधार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रमेश म्हात्रे का आपराधिक पूर्ववृत्त (Criminal Antecedents) जमानत पर फैसला लेते समय महत्वपूर्ण पहलू था। कोर्ट के अनुसार, म्हात्रे के खिलाफ कुल 18 आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। इनमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 307 के तहत मामले भी शामिल थे। हालांकि, इन 18 मामलों में से 16 मामले बरी होने या आरोपमुक्ति (Discharge) के साथ समाप्त हो चुके थे। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके आपराधिक पूर्ववृत्त को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय आपराधिक रिकॉर्ड के साथ-साथ न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप की संभावना और दोबारा आपराधिक गतिविधि में शामिल होने की आशंका भी प्रासंगिक होती है। खासकर तब, जब मामले के महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही अभी बाकी हो।
जेल वार्ड में भर्ती रहने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पुलिस और न्यायिक हिरासत के दौरान रमेश म्हात्रे ठाणे सिविल अस्पताल के जेल वार्ड में भर्ती रहे। कोर्ट के अनुसार, रिलीज मेमो (Release Memo) जारी होने के तुरंत बाद उन्होंने अस्पताल से डिस्चार्ज मांगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि क्या म्हात्रे ने अपने निर्वाचित पद से जुड़े प्रभाव का इस्तेमाल हिरासत की प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए किया था। कोर्ट ने इस पहलू को भी जमानत पर विचार करते समय प्रासंगिक माना।
दूसरे आरोपियों को समानता के आधार पर राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अन्य तीन आरोपी केवल समानता (Parity) के आधार पर जमानत जारी रखने का दावा नहीं कर सकते। जब रमेश म्हात्रे को जमानत देने का मूल आधार ही टिकाऊ नहीं पाया गया, तो उसी आधार पर अन्य आरोपियों को भी जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने माना कि आपराधिक पूर्ववृत्त, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप की संभावना और दोबारा अपराध करने की आशंका जमानत के निर्णय में प्रासंगिक कारक हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने म्हात्रे और तीनों सह-आरोपियों की जमानत रद्द कर दी।
चारों आरोपियों को 5 अक्टूबर तक सरेंडर का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने रमेश म्हात्रे और तीनों सह-आरोपियों को 5 अक्टूबर 2026 तक ट्रायल कोर्ट (विचारण अदालत) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव होने पर आरोपी दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह स्वतंत्र रूप से जांच करे कि मामले में लागू निवारक निरोध कानूनों (Preventive Detention Laws) के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं।
