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जौनपुर कस्टोडियल डेथ: पुलिस की कथित बर्बरता के बाद मौत, 4 आरोपी पुलिसकर्मियों को हाईकोर्ट से जमानत नहीं

जौनपुर कस्टोडियल डेथ मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार आरोपी पुलिसकर्मियों की जमानत खारिज कर दी। CBI ने पुलिस पर हिरासत में कृष्ण कुमार यादव को यातना देने और मौत का आरोप लगाया है, जबकि AIIMS मेडिकल बोर्ड ने शरीर पर कई चोटों की पुष्टि की थी।

Sonali03 अक्टू. 2026, 07:35 PM IST
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जौनपुर कस्टोडियल डेथ: पुलिस की कथित बर्बरता के बाद मौत, 4 आरोपी पुलिसकर्मियों को हाईकोर्ट से जमानत नहीं

जौनपुर के 2021 के कृष्ण कुमार यादव उर्फ पुजारी कस्टोडियल डेथ (पुलिस हिरासत में मौत) मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार आरोपी पुलिसकर्मियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। न्यायमूर्ति समित गोपाल ने 95 पन्नों के आदेश में CBI (केंद्रीय जांच ब्यूरो) की चार्जशीट में लगाए गए आरोपों, मेडिकल रिपोर्ट और मामले की गंभीरता पर विचार किया। CBI का आरोप है कि कृष्ण कुमार से कथित तौर पर कबूलनामा (confession) कराने के लिए उसे गंभीर चोटें पहुंचाई गईं और बाद में ऐसी चोटें दी गईं, जिनसे उसकी मौत हो गई। CBI के अनुसार, पुलिस हिरासत में हुई कथित मारपीट को छिपाने के लिए रिकॉर्ड में भी हेरफेर किया गया।

क्या है पूरा मामला?

मामला फरवरी 2021 का है। जौनपुर के बक्शा थाना क्षेत्र में रहने वाले कृष्ण कुमार यादव उर्फ पुजारी को 11 फरवरी 2021 की रात करीब 3 बजे SOG (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) की टीम और तत्कालीन बक्शा थाना प्रभारी समेत अन्य पुलिसकर्मी उसके घर से अपने साथ ले गए थे। मामले में 12 फरवरी 2021 को बक्शा थाना में IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 302, 394, 452 और 504 के तहत FIR (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज की गई थी। FIR में परिवार की ओर से आरोप लगाया गया कि पुलिसकर्मी कृष्ण कुमार को रात में घर से ले गए। बाद में उसी दिन पुलिसकर्मी उसे वापस लेकर आए तो उसकी हालत बेहद खराब थी। आरोप है कि कृष्ण कुमार ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। उसने अपनी मां से पुलिस से बचाने की गुहार लगाई और कहा कि पुलिसकर्मी उसे मार डालेंगे। इसके बाद परिवार को जानकारी मिली कि कृष्ण कुमार की पुलिस हिरासत में मौत हो गई है। यहीं से मामला गंभीर पुलिस हिरासत में मौत के आरोप में बदल गया।

शुरुआत में पोस्टमार्टम में क्या बताया गया?

कृष्ण कुमार के शव का शुरुआती पोस्टमार्टम कराया गया। मूल पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर तीन contusions (नील/चोट के निशान) दर्ज किए गए थे। इनमें नितंब, कंधे के नीचे के हिस्से और बाएं हाथ पर चोट शामिल थी। शुरुआती रिपोर्ट में मौत का कारण shock and syncope (शॉक और अचानक बेहोशी) बताया गया था और इसे myocardial infarction (हृदयाघात) से जोड़ा गया था। हालांकि, बाद में जांच के दौरान इस मेडिकल निष्कर्ष पर सवाल उठा और मामले में दोबारा मेडिकल राय ली गई।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI को सौंपी गई जांच

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट में कार्यवाही हुई और सितंबर 2021 में जांच CBI को सौंप दी गई। इसके बाद CBI ने अपनी FIR दर्ज कर पूरे मामले की जांच शुरू की। CBI ने जांच के बाद 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। आरोप IPC की धारा 302, 330, 331 और 218 के साथ धारा 34 तथा 120-B के तहत लगाए गए।

इनमें धारा 302 हत्या, धारा 330 और 331 हिरासत में व्यक्ति को चोट पहुंचाने/कबूलनामा या जानकारी हासिल करने के लिए चोट पहुंचाने से संबंधित हैं, जबकि धारा 218 गलत रिकॉर्ड तैयार करने से जुड़ी है। धारा 34 और 120-B क्रमशः साझा मंशा और आपराधिक साजिश से संबंधित हैं। बाद में लखनऊ की विशेष CBI अदालत ने 18 सितंबर 2024 को आरोप तय किए। मामले का ट्रायल जारी है। हाईकोर्ट के अनुसार अब तक अभियोजन पक्ष के 11 गवाहों की गवाही दर्ज हो चुकी है।

CBI ने क्या आरोप लगाया?

CBI की चार्जशीट के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर कृष्ण कुमार से कबूलनामा हासिल करने के लिए उसे गंभीर शारीरिक चोटें पहुंचाईं। CBI का आरोप है कि इसके बाद उसे ऐसी चोटें दी गईं, जो उसकी मौत के लिए पर्याप्त थीं। जांच एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि कथित पुलिस हिरासत में मारपीट और मौत को छिपाने के लिए गलत रिकॉर्ड तैयार किए गए। रिकॉर्ड में मौत को दुर्घटना या अज्ञात लोगों के हमले से जोड़कर दिखाने का प्रयास किए जाने का आरोप लगाया गया। हालांकि, ये सभी CBI के जांच के दौरान सामने आए आरोप हैं और इनका अंतिम न्यायिक निर्धारण ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर होना बाकी है।

AIIMS मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ने बदला जांच का रुख

CBI ने AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान), नई दिल्ली के मेडिकल बोर्ड की बाद की राय को भी आधार बनाया। मेडिकल बोर्ड ने कहा कि कृष्ण कुमार के शरीर पर multiple blunt-force injuries (कुंद वस्तु से लगी कई चोटें) थीं। बोर्ड के अनुसार ये चोटें मृत्यु से पहले लगी थीं और ताजा थीं। मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण शरीर पर लगी कई कुंद चोटों के सामूहिक प्रभाव से हुआ shock बताया। बोर्ड की राय में चोटें इतनी गंभीर थीं कि वे सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु के लिए पर्याप्त थीं। यही मेडिकल राय शुरुआती पोस्टमार्टम में बताए गए हृदयाघात से जुड़े कारण से अलग थी और CBI की जांच में महत्वपूर्ण मानी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने भी एक आरोपी की जमानत रद्द की थी

इस मामले में सह-आरोपी पुलिसकर्मी जितेंद्र सिंह को मिली जमानत भी सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च 2024 को रद्द कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कस्टोडियल डेथ (पुलिस हिरासत में मौत) के आरोप की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए जमानत के मामले में सख्त दृष्टिकोण अपनाने की बात कही थी। कोर्ट ने IPC की धारा 302 के तहत लगे हत्या के आरोप की गंभीरता को भी ध्यान में रखा और आरोपी को CBI अदालत के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश दिया था।

अब किन चार पुलिसकर्मियों की जमानत खारिज हुई?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिन चार पुलिसकर्मियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं, उनमें:

  • जयशील तिवारी

  • रामकृत यादव

  • राज कुमार वर्मा

  • अंगद प्रसाद चौधरी

शामिल हैं।

जयशील तिवारी की जमानत क्यों नहीं मिली?

हाईकोर्ट ने जयशील तिवारी के मामले में उनके कथित फरार रहने के आचरण को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान उनके खिलाफ CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता) की धारा 82 और 83 के तहत कार्रवाई की गई थी। इसके बाद वह ट्रायल के दौरान भी कथित तौर पर फरार हुए और बाद में गिरफ्तार किए गए। हाईकोर्ट ने इस आचरण को जांच और मुकदमे में सहयोग नहीं करने तथा भविष्य में दोबारा फरार होने की संभावना से जुड़ा माना। इसलिए उन्हें जमानत नहीं दी गई।

रामकृत यादव और राज कुमार वर्मा की दूसरी जमानत याचिका

रामकृत यादव और राज कुमार वर्मा ने दूसरी बार जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। इससे पहले 2022 में उनकी जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं। इस बार हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी कोई नई परिस्थिति या नया आधार सामने नहीं आया है, जिसके कारण पहले के आदेश पर दोबारा विचार किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल किसी सह-आरोपी को मिली जमानत के आधार पर दूसरे आरोपी को जमानत देना जरूरी नहीं है।

हाईकोर्ट ने मामले को बताया गंभीर

हाईकोर्ट ने संबंधित पुराने आदेश में की गई अपनी टिप्पणियों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने मामले को कथित तौर पर “custodial torture and death with robbery in a well-planned conspiracy” से जुड़ा बताया था। कोर्ट ने इसे पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग और पुलिस की कथित मनमानी से जुड़ा मामला भी बताया था। वर्तमान आदेश में हाईकोर्ट ने चारों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं और ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने तथा अनावश्यक स्थगन (adjournment) से बचने का निर्देश दिया है।

अब मामले की स्थिति क्या है?

इस मामले में CBI की चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोप तय हो चुके हैं और ट्रायल जारी है। हाईकोर्ट के ताजा आदेश के मुताबिक अभियोजन पक्ष के 11 गवाहों की गवाही दर्ज हो चुकी है। फिलहाल चार आरोपी पुलिसकर्मियों—जयशील तिवारी, रामकृत यादव, राज कुमार वर्मा और अंगद प्रसाद चौधरी—को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत नहीं मिली है। मामले में लगाए गए आरोपों का अंतिम फैसला ट्रायल पूरा होने के बाद अदालत द्वारा साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।