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बालिग बेटी की मर्जी के खिलाफ उसे साथ नहीं रख सकते माता-पिता: HC

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। 25 वर्षीय बेटी के मां के साथ रहने से इनकार के बाद कोर्ट ने Habeas Corpus (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका खारिज कर दी।

Sonali06 अक्टू. 2026, 03:10 PM IST
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बालिग बेटी की मर्जी के खिलाफ उसे साथ नहीं रख सकते माता-पिता: HC

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि माता-पिता Habeas Corpus (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका का इस्तेमाल अपनी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के खिलाफ अपने साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि जब कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा और समझ से यह तय करता है कि उसे कहां रहना है, तो उसकी स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने कलावती देवी की ओर से दाखिल याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में मां ने अपनी बेटी पूजा को कोर्ट के सामने पेश करने की मांग की थी।

क्या है पूरा मामला?

मामले में 25 वर्षीय पूजा को कोर्ट के सामने पेश किया गया। कोर्ट के 17 अगस्त 2026 के निर्देश के बाद घोसी थाना, जिला मऊ की पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया।

कोर्ट से बातचीत के दौरान पूजा ने साफ कहा कि वह अपनी मां के साथ नहीं रहना चाहती। उसने बताया कि वह दिल्ली में स्वतंत्र रूप से रह रही है और किसी व्यक्ति की अवैध या गैरकानूनी हिरासत में नहीं है। पूजा ने अपने माता-पिता के घर के माहौल को लेकर भी आरोप लगाए। उसने कहा कि उसकी मां का व्यवहार उसके प्रति अच्छा नहीं रहा और उसे कई बार अपने घर में मारपीट और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर, मां कलावती देवी ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि वह चाहती हैं कि उनकी बेटी उनके साथ पैतृक घर में रहे।

कोर्ट ने क्या कहा?

पूजा से बातचीत और उसके बयान को पूरी तरह देखने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि वह बालिग है और उसने अपनी इच्छा से मां के साथ नहीं रहने का स्पष्ट फैसला लिया है।

कोर्ट ने कहा कि जब Habeas Corpus (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका में पेश किया गया व्यक्ति बालिग हो और अपने निवास को लेकर “स्पष्ट, स्वैच्छिक और बिना किसी भ्रम के” फैसला कर चुका हो, तो उसकी स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“किसी बालिग व्यक्ति को उसकी व्यक्त इच्छा के खिलाफ किसी खास व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, भले ही वह व्यक्ति उसका माता-पिता ही क्यों न हो।”

Habeas Corpus याचिका कब होती है?

हाईकोर्ट ने समझाया कि Habeas Corpus (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की कार्यवाही का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध या गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराना है। इस अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल सामान्य तौर पर किसी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रहने के लिए मजबूर करने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि वह व्यक्ति अवैध हिरासत में है। इस मामले में कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह पता चले कि पूजा को किसी ने अवैध रूप से हिरासत में रखा है या उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर किसी तरह की रोक लगाई जा रही है। इसके विपरीत, पूजा ने कोर्ट के सामने स्पष्ट रूप से कहा कि वह दिल्ली में अपनी इच्छा से स्वतंत्र रूप से रह रही है और उसने अपनी मां के साथ नहीं रहने का फैसला खुद लिया है।

बेटी को अपनी पसंद से रहने की आजादी

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में Habeas Corpus याचिका को बनाए रखने के लिए जरूरी आधार ही मौजूद नहीं था। इसलिए कोर्ट ने मां की याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने साथ ही निर्देश दिया कि पूजा बालिग और सक्षम व्यक्ति होने के कारण अपनी पसंद की जगह पर और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र है।

इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बालिग बेटी के माता-पिता होने मात्र से उन्हें यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे उसकी इच्छा के खिलाफ उसके रहने की जगह तय कर सकें।