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सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के 5 अहम फैसले: वाहन जब्ती से लेकर POCSO और NSA तक, जानिए कोर्ट ने क्या कहा

सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के अधिकारों और आपराधिक न्याय प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले दिए। कोर्ट ने फाइनेंस कंपनियों द्वारा जबरन वाहन जब्त करने पर RBI को सख्ती से नियम लागू करने का निर्देश दिया, गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताने वाले पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की बात कही। इसके अलावा POCSO के दुरुपयोग, NSA के तहत निवारक हिरासत और आरोपी को अभियोजन की अप्रयुक्त सामग्री उपलब्ध कराने के अधिकार पर भी अहम दिशा-निर्देश दिए।

Sonali05 अक्टू. 2026, 03:49 PM IST
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सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के 5 अहम फैसले: वाहन जब्ती से लेकर POCSO और NSA तक, जानिए कोर्ट ने क्या कहा

नई दिल्ली। 

सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई महत्वपूर्ण फैसले सुनाए, जिनका सीधा संबंध नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, आपराधिक मामलों में निष्पक्ष प्रक्रिया और वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी से है। इन फैसलों में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में दिए गए सुरक्षा उपाय केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकते, बल्कि उनका वास्तविक पालन भी सुनिश्चित होना चाहिए।


  1. फाइनेंस कंपनी जबरन वाहन जब्त नहीं कर सकती

Hari Dutta Sharma बनाम State of U.P. मामले में जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने फाइनेंस कंपनियों और NBFCs द्वारा वाहनों की जबरन जब्ती के मामले में महत्वपूर्ण निर्देश दिए। मामला एक ट्रक से जुड़ा था, जिसे कथित तौर पर रात करीब 1 बजे कंपनी के चार अज्ञात लोगों ने बिना पूर्व सूचना लॉक तोड़कर जब्त कर लिया था। कोर्ट ने माना कि वाहन मालिक अपनी आजीविका के लिए इसी ट्रक पर निर्भर था और इस तरह वाहन छीनना उसके आजीविका के अधिकार को प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंस कंपनी को लोन अकाउंट बंद करने, वाहन की बिक्री से प्राप्त 45,000 रुपये 6 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस करने और मानसिक पीड़ा के लिए 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने RBI को भी निर्देश दिया कि बैंकों और NBFCs के लिए वाहन जब्ती और रिकवरी एजेंटों से संबंधित दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन कराया जाए। कोर्ट ने कहा कि RBI की फेयर प्रैक्टिस और रिकवरी संबंधी गाइडलाइंस केवल कागजों पर नहीं रहनी चाहिए।


  1. गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर विभागीय जांच

Jaskaran Jeet Singh Deol बनाम State of Punjab मामले में जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुरकर की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारण जानने के अधिकार को महत्वपूर्ण बताया। कोर्ट ने कहा कि यदि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं दिए गए हैं, तो ऐसी गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध हो सकती है। अगर शुरुआती गिरफ्तारी और रिमांड अवैध घोषित होने के बाद आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करना है, तो जांच एजेंसी को पहले गिरफ्तारी के लिखित कारण देने होंगे। इसके बाद क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देकर बताना होगा कि पहले कारण क्यों नहीं बताए गए और अब हिरासत की आवश्यकता क्यों है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी दोबारा गिरफ्तारी मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना नहीं होनी चाहिए। साथ ही, गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश दिया जाना चाहिए।


  1. वैवाहिक विवाद में POCSO के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

'R' बनाम 'E' मामले में जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने वैवाहिक विवादों में POCSO Act के कथित दुरुपयोग को लेकर महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय तय किए। कोर्ट ने कहा कि यदि वैवाहिक विवाद के दौरान माता-पिता या बच्चे के साथ रहने वाले परिवार के किसी सदस्य पर POCSO के तहत आरोप लगाया जाता है, तो FIR दर्ज होना अपने आप गिरफ्तारी का आधार नहीं बनना चाहिए। गिरफ्तारी की जरूरत तय करने से पहले जांच अधिकारी को जिला बाल संरक्षण इकाई के परामर्श से Child and Adolescent Psychiatrist या Clinical Psychologist से बच्चे का स्वतंत्र मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराना होगा। इस विशेषज्ञ रिपोर्ट को अन्य सामग्री के साथ देखकर गिरफ्तारी पर फैसला लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन सुरक्षा उपायों का उद्देश्य POCSO Act की सुरक्षा को कमजोर करना नहीं है। वास्तविक बाल यौन शोषण के मामलों में कानून की सख्ती बनी रहेगी। मामले में CBI जांच और NIMHANS विशेषज्ञों के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद बच्चे के आरोपों को अविश्वसनीय पाया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने FIR रद्द कर बच्चे को विशेषज्ञों की निगरानी में चरणबद्ध तरीके से पिता के साथ दोबारा रहने की व्यवस्था का निर्देश दिया।


  1. केवल हिरासत में दिए गए सह-आरोपी के बयान पर NSA की हिरासत नहीं

Mulla Afroz बनाम Union of India मामले में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (National Security Act-NSA) के तहत की गई निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। मामला नवंबर 2024 के संभल हिंसा मामले से जुड़ा था। आरोपी अफरोज की NSA के तहत हिरासत मुख्य रूप से पुलिस हिरासत में सह-आरोपी द्वारा दिए गए कथित इकबालिया बयान पर आधारित थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिया गया इकबालिया बयान निवारक हिरासत का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। हिरासत का आदेश देने वाले प्राधिकारी को संबंधित परिस्थितियों और उपलब्ध अन्य महत्वपूर्ण सामग्री पर भी विचार करना होगा। कोर्ट ने निवारक हिरासत को कानूनी रूप से अस्थिर मानते हुए रद्द कर दिया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का खर्च भी लगाया।


  1. आरोपी को अभियोजन की अप्रयुक्त सामग्री तक उचित चरण में पहुंच का अधिकार

Central Bureau of Investigation बनाम Anil Dixit मामले में जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी जांच के दौरान जब्त लेकिन अभियोजन द्वारा इस्तेमाल नहीं किए गए दस्तावेजों तक उचित चरण में पहुंच की मांग कर सकता है। मामले में आरोपी ने CrPC की धारा 91 के तहत कई दस्तावेज मांगे थे, जिनमें जब्ती रिकॉर्ड, CBI रजिस्टर, अप्रयुक्त दस्तावेज, बिल्डिंग कमेटी की कार्यवाही, मूल्यांकन समिति के रिकॉर्ड, तकनीकी बोलियां और नियुक्ति संबंधी फाइलें शामिल थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को बचाव की तैयारी के लिए अभियोजन एजेंसी के पास उपलब्ध जरूरी दस्तावेजों तक पहुंच मिल सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोपी आरोप तय होने के चरण में सभी अप्रयुक्त और बड़ी मात्रा में मौजूद दस्तावेजों की प्रतियां मांग सकता है। कोर्ट ने आरोपी को बड़ी मात्रा में अप्रयुक्त सामग्री का निरीक्षण करने और बचाव के लिए जरूरी विशिष्ट दस्तावेजों की पहचान करने की अनुमति दी। इसके बाद उचित चरण पर उन दस्तावेजों को पेश करने की मांग की जा सकती है। इन पांच फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग क्षेत्रों में एक समान सिद्धांत पर जोर दिया—कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा केवल औपचारिक प्रावधान नहीं हैं। चाहे वाहन की जब्ती हो, गिरफ्तारी हो, POCSO का इस्तेमाल हो, निवारक हिरासत हो या आरोपी को मुकदमे से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने का सवाल, प्रक्रिया में निष्पक्षता और अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है।