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“परिवार के सदस्यों के नाम से कंपनी बनाने को किराए की दुकान किसी दूसरे को देना नहीं माना गया; बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1998 में जारी बेदखली का आदेश रद्द कर दिया।”

मुंबई में किराए के कारोबारी परिसर से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोपराइटरशिप फर्म को पार्टनरशिप और फिर परिवार के सदस्यों वाली प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदलना अपने आप में सबलेटिंग (किराए की संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को देना) नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब कारोबार और परिसर में किसी बाहरी व्यक्ति को शामिल नहीं किया गया, तो केवल कारोबारी ढांचा बदलने के आधार पर बेदखली नहीं की जा सकती।

Sonali05 अक्टू. 2026, 03:49 PM IST
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“परिवार के सदस्यों के नाम से कंपनी बनाने को किराए की दुकान किसी दूसरे को देना नहीं माना गया; बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1998 में जारी बेदखली का आदेश रद्द कर दिया।”

प्रोपराइटरशिप फर्म को पार्टनरशिप और फिर परिवार के सदस्यों वाली प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदलना अपने आप में सबलेटिंग (किराए की संपत्ति किसी दूसरे व्यक्ति को देना) नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जब मूल किरायेदार के परिवार के सदस्यों के अलावा किसी तीसरे व्यक्ति को कारोबार या परिसर के कब्जे में शामिल नहीं किया गया हो, तो केवल कारोबारी ढांचे में बदलाव के आधार पर किरायेदार को सब-लेटिंग का दोषी नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने इसी आधार पर बेदखली से जुड़े पुराने आदेशों को रद्द कर दिया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला मुंबई के 31 Forbes Street स्थित Indian Mercantile Insurance Building (Kirti Building) के Room Nos. 1 और 2 से जुड़ा था। इन परिसरों में Y.D. Ahuja की प्रोपराइटरशिप फर्म M/s Economy Engineering Co. कारोबार करती थी। बाद में कारोबार के स्वरूप में बदलाव किया गया। प्रोपराइटरशिप को पार्टनरशिप फर्म में बदला गया, जिसमें Ahuja के बेटे और पत्नी शामिल हुए। इसके बाद कारोबार को M/s Economy Refrigeration Pvt. Ltd. नाम की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में चलाया जाने लगा। कंपनी में भी Ahuja परिवार के सदस्य ही शामिल रहे। विवाद तब खड़ा हुआ जब Oriental Insurance Company ने इस बदलाव को सबलेटिंग मान लिया। कंपनी की ओर से आपत्ति की गई कि किराए की जगह पर मूल किरायेदार के बजाय अब एक अलग कानूनी इकाई के जरिए कारोबार चलाया जा रहा है। आरोप था कि कारोबार को कंपनी में ट्रांसफर करने के लिए जरूरी अनुमति नहीं ली गई थी। इसी आधार पर बेदखली की कार्रवाई शुरू हुई। Estate Officer ने 30 सितंबर 1998 को परिसर खाली कराने का आदेश पारित किया। इसके खिलाफ मामला Bombay City Civil Court पहुंचा, लेकिन 31 जनवरी 2002 को सिटी सिविल कोर्ट ने भी Estate Officer के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद M/s Economy Engineering Co., M/s Economy Refrigeration Pvt. Ltd. और Y.D. Ahuja के उत्तराधिकारियों ने Bombay High Court में Writ Petition No. 1158 of 2002 दायर की। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि कारोबार में किसी बाहरी व्यक्ति को शामिल नहीं किया गया है और केवल परिवार के भीतर ही व्यवसाय की कानूनी संरचना बदली गई है। इसलिए इसे सबलेटिंग नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्ताओं की दलील स्वीकार की। कोर्ट ने कहा कि प्रोपराइटरशिप से पार्टनरशिप और फिर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में कारोबार का रूपांतरण मात्र यह साबित नहीं करता कि किराए की संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को सौंप दी गई। कोर्ट ने खास तौर पर इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि पार्टनरशिप फर्म और बाद में बनी कंपनी में Ahuja परिवार के सदस्य ही शामिल थे। किसी बाहरी व्यक्ति को कारोबार या परिसर के कब्जे में शामिल नहीं किया गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कारोबारी इकाई का कानूनी स्वरूप बदलना और किराए की संपत्ति का कब्जा किसी तीसरे व्यक्ति को सौंपना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए केवल कंपनी बनाने या कारोबार को नई कानूनी इकाई के नाम से चलाने के आधार पर सबलेटिंग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

2015 के संशोधन पर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Act, 1971 (सार्वजनिक परिसर से अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली अधिनियम) की धारा 5 में 2015 में किए गए संशोधन के प्रभाव पर भी विचार किया। कोर्ट ने माना कि इस संशोधन को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि परिवार के भीतर कारोबारी पुनर्गठन को ही सबलेटिंग मान लिया जाए, जबकि परिसर का वास्तविक कब्जा किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं दिया गया हो।

पुराने बेदखली आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने Estate Officer के 30 सितंबर 1998 के बेदखली आदेश और Bombay City Civil Court के 31 जनवरी 2002 के आदेश को रद्द कर दिया। इस फैसले में कोर्ट ने साफ किया कि किसी पारिवारिक कारोबार को समय के साथ पार्टनरशिप या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदलना और किराए की संपत्ति का वास्तविक कब्जा किसी तीसरे व्यक्ति को देना एक ही बात नहीं है। जब कारोबार का नियंत्रण और परिसर का उपयोग मूल किरायेदार के परिवार के भीतर ही बना रहता है, तो केवल कानूनी कारोबारी ढांचे में बदलाव को सबलेटिंग मानकर बेदखली नहीं की जा सकती।