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मुकदमा वापस लेने के बदले मनमानी रकम मांगना 'जबरन वसूली' नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने फ्लैट खरीदारों के खिलाफ FIR रद्द की
मुकदमा वापस लेने के लिए समझौते के दौरान बहुत ज्यादा या अनुपातहीन रकम की मांग करना अपने आप में जबरन वसूली (Extortion) का अपराध नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 385 के तहत अपराध साबित करने के लिए किसी व्यक्ति को जानबूझकर धमकी देना या चोट/नुकसान का डर पैदा करना जरूरी है। इसी आधार पर जस्टिस रंजितसिंह राजा भोंसले की पीठ ने फ्लैट खरीदारों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी।

मामला क्या था?
मामला फ्लैट खरीदारों और दूसरे पक्ष के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा था। विवाद के समाधान के लिए दोनों पक्षों के बीच समझौते (Settlement) को लेकर बातचीत चल रही थी। इसी दौरान फ्लैट खरीदारों की ओर से कथित तौर पर विवाद खत्म करने और मुकदमा वापस लेने के बदले एक बड़ी रकम की मांग की गई। दूसरे पक्ष ने इस मांग को अनुचित और बहुत अधिक बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि मुकदमा वापस लेने के लिए इतनी बड़ी रकम मांगना जबरन वसूली का प्रयास है। शिकायत के आधार पर IPC की धारा 385 के तहत FIR दर्ज की गई। इसके बाद फ्लैट खरीदारों ने FIR रद्द करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया। उनका कहना था कि समझौते के लिए बातचीत के दौरान किसी रकम की मांग को केवल इसलिए जबरन वसूली नहीं कहा जा सकता क्योंकि रकम बहुत अधिक थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस रंजितसिंह राजा भोंसले ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल किसी विवाद को समाप्त करने या मुकदमा वापस लेने के बदले बड़ी या अनुपातहीन रकम की मांग करना IPC की धारा 385 के तहत अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जबरन वसूली से जुड़े अपराध के लिए केवल पैसों की मांग पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह दिखाना होगा कि आरोपी ने जानबूझकर किसी व्यक्ति को चोट या किसी अन्य नुकसान का भय दिखाया अथवा ऐसी धमकी दी, जिससे वह व्यक्ति दबाव में आकर रकम देने के लिए मजबूर हुआ।mकोर्ट ने कहा कि Settlement (समझौता) के दौरान किसी पक्ष की ओर से रखी गई आर्थिक मांग, चाहे वह बहुत अधिक ही क्यों न हो, अपने आप में आपराधिक धमकी नहीं बन जाती।
FIR रद्द
हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में IPC की धारा 385 के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया (Prima Facie) स्थापित नहीं होते। इसलिए कोर्ट ने फ्लैट खरीदारों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने 'बड़ी रकम की मांग' और 'धमकी देकर रकम वसूलने' के बीच अंतर स्पष्ट किया है। केवल समझौते के दौरान अधिक रकम मांगना तभी जबरन वसूली का अपराध बनेगा, जब उसके साथ कानून में आवश्यक धमकी या नुकसान का भय पैदा करने वाला तत्व भी मौजूद हो।
