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12 साल बाद कोर्ट का फैसला: सबूत नहीं जुटा सकी पुलिस, चेन-मंगलसूत्र लूट के दो मामलों में दोनों आरोपी दोषमुक्त

डोंबिवली पूर्व में चेन और मंगलसूत्र लूट के 12-13 साल पुराने दो मामलों में पुलिस जांच और अभियोजन के कमजोर साक्ष्यों का फायदा आरोपियों को मिला। कल्याण कोर्ट ने अरुण गोटीराम आदईकर और शिवाजी बाळाराम भोपी को बरी कर दिया।

Sonali07 अक्टू. 2026, 05:03 PM IST
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12 साल बाद कोर्ट का फैसला: सबूत नहीं जुटा सकी पुलिस, चेन-मंगलसूत्र लूट के दो मामलों में दोनों आरोपी दोषमुक्त

कल्याण कोर्ट ने डोंबिवली पूर्व में महिलाओं से सोने की चेन और मंगलसूत्र लूटने से जुड़े करीब 12 और 13 साल पुराने दो अलग-अलग मामलों में आरोपी अरुण गोटीराम आदईकर और शिवाजी बाळाराम भोपी को बरी कर दिया है। दोनों मामलों में अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान और वारदात में उनकी भूमिका को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। एक मामले में शिकायतकर्ता ने आरोपियों को पहचानने से इनकार किया, जबकि दूसरे मामले में शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया कि घटना के समय उसने आरोपियों को देखा ही नहीं था। दोनों मामलों में महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही भी अभियोजन के पक्ष को मजबूत नहीं कर सकी।


पहला मामला 27 जून 2013 का है। डोंबिवली पूर्व के गणेश नगर इलाके में किरण सुरेंद्र दबे अपने बच्चों को स्कूल छोड़कर वापस लौट रही थीं। अभियोजन के अनुसार, पल्सर मोटरसाइकिल पर आए दो लोगों ने उन्हें रोका और उनमें से एक ने उनके साथ मारपीट कर गले से करीब तीन तोले वजन की सोने की चेन खींच ली। चेन की कीमत करीब 75 हजार रुपये बताई गई थी। इस मामले में मानपाड़ा पुलिस ने IPC की धारा 394 (मारपीट कर लूट) और धारा 34 (साझा आपराधिक मंशा) के तहत मामला दर्ज किया था।

इस मामले में ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता किरण दबे की ही गवाही हुई। उन्होंने घटना में दो लोगों द्वारा चेन खींचे जाने की बात कही, लेकिन अदालत में साफ तौर पर कहा कि वह आरोपियों को पहचानती नहीं हैं और उनके नाम भी नहीं बता सकतीं। अभियोजन पक्ष ऐसा कोई प्रत्यक्षदर्शी भी पेश नहीं कर सका जिसने आरोपियों को वारदात करते देखा हो। जांच अधिकारी आर. वी. वाघमारे समेत अन्य महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही भी अदालत में नहीं कराई गई। इसके चलते अदालत ने माना कि आरोपियों को घटना से जोड़ने के लिए पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।


दूसरा मामला 4 अक्टूबर 2013 का है। डोंबिवली पूर्व के गांधीनगर इलाके में हिराबाई यशवंत हक्के कपड़े प्रेस कराने जा रही थीं। अभियोजन के अनुसार, मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों में पीछे बैठे व्यक्ति ने उनके गले से करीब 25 ग्राम वजन का सोने का मंगलसूत्र खींच लिया। मंगलसूत्र खींचे जाने के दौरान हिराबाई के गले और बाएं हाथ में चोट आई थी। इस मामले में भी अरुण आदईकर और शिवाजी भोपी पर IPC की धारा 394 सहपठित धारा 34 के तहत आरोप लगाए गए थे।

मंगलसूत्र लूट मामले में पंच गवाह राजू शंकर देवरुखकर की गवाही भी अभियोजन के लिए मददगार साबित नहीं हुई। उसने अदालत में बताया कि पुलिस ने पंचनामे पहले ही तैयार कर लिए थे और बाद में उससे हस्ताक्षर करवाए गए। उसने यह भी कहा कि पुलिस के कहने पर उसे गवाही के लिए बुलाया गया था। अदालत ने उसकी गवाही को विश्वसनीय नहीं माना। शिकायतकर्ता हिराबाई हक्के ने घटना में दो लोगों द्वारा मंगलसूत्र खींचे जाने की बात कही, लेकिन जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि घटना के समय उन्होंने आरोपियों को देखा नहीं था। ऐसे में उनकी गवाही से आरोपियों की पहचान साबित नहीं हो सकी। एक अन्य गवाह रंजीत नवनाथ कांभर ने घटना के बाद शिकायतकर्ता की मदद करने की बात कही, लेकिन उसकी गवाही भी आरोपियों को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं पाई गई।


दोनों मामलों में कल्याण के JMFC कोर्ट नंबर-3 के न्यायिक मजिस्ट्रेट निलेश प्रभाकर वासाडे ने 28 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष दोनों आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 394 और 34 के तहत आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसके आधार पर दोनों आरोपियों को CrPC की धारा 248(1) के तहत बरी कर दिया गया। मंगलसूत्र लूट मामले में अदालत ने जब्त बिना नंबर प्लेट वाली काली बजाज पल्सर मोटरसाइकिल को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नीलाम करने और राशि सरकारी खाते में जमा करने का आदेश दिया। वहीं करीब 25 ग्राम का काले मोतियों वाला मंगलसूत्र अपील की अवधि समाप्त होने के बाद शिकायतकर्ता को स्थायी रूप से लौटाने का निर्देश दिया गया। पहले चेन लूट मामले में बरामद सोने की चेन पहले ही शिकायतकर्ता को सौंपे जाने के कारण अपील की अवधि समाप्त होने के बाद उसे स्थायी रूप से सुपुर्द करने का आदेश दिया गया।