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हिंदू महिला के संपत्ति अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया नियम, उत्तराधिकार का निर्धारण मृत्यु के समय लागू कानून से होगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत किसी हिंदू महिला का संपत्ति पर सीमित अधिकार पूर्ण स्वामित्व में बदल सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार का निर्धारण महिला की मृत्यु के समय लागू व्यक्तिगत कानून और उस समय उसके पास मौजूद संपत्ति के अधिकारों के आधार पर किया जाना चाहिए।
Sonali12 अक्टू. 2026, 04:19 PM IST

जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने दिल्ली की लगभग 45 बीघा कृषि भूमि से जुड़े विवाद में यह फैसला सुनाया। विवाद एक महिला के पहले पति के परिवार के उत्तराधिकारियों और दूसरी शादी से हुए उसके दो बेटों के बीच था। अदालत ने अपील खारिज करते हुए महिला के बेटों के पक्ष में संपत्ति के अधिकार से जुड़े फैसले को बरकरार रखा। मामले के अनुसार, खजानो को अपने पहले पति मौजी राम और उनके बेटे राम चंदर से संबंधित संपत्ति में सीमित अधिकार प्राप्त हुआ था। उस समय लागू कानून के तहत उसका अधिकार पूर्ण स्वामित्व का नहीं था। बाद में खजानो ने बल किशन से दूसरी शादी की, जिससे उसके दो बेटे चांद राम और चंदर भान हुए। खजानो को दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 के तहत भूमिधर के रूप में मान्यता मिली थी। वर्ष 1973 में उसकी मृत्यु हो गई। खजानो की मृत्यु के बाद उसके दोनों बेटों ने कृषि भूमि के राजस्व रिकॉर्ड में अपने नाम दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, मौजी राम के परिवार के सदस्यों ने इस पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि खजानो को संपत्ति में केवल सीमित अधिकार मिला था, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद जमीन पहले पति के परिवार के उत्तराधिकारियों को मिलनी चाहिए। राजस्व अधिकारियों ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत कानून की निर्धारित शर्तें पूरी होने पर किसी हिंदू महिला के पास मौजूद संपत्ति में उसका सीमित अधिकार पूर्ण स्वामित्व में बदल सकता है। अदालत ने कहा कि खजानो का सीमित संपत्ति अधिकार 1956 में अधिनियम लागू होने के बाद पूर्ण स्वामित्व में बदल गया था, जबकि उसकी मृत्यु 1973 में हुई। अदालत ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि खजानो के संपत्ति अधिकार और उत्तराधिकार का निर्धारण केवल उस समय लागू कानून के आधार पर किया जाना चाहिए, जब उसे मूल रूप से संपत्ति में अधिकार मिला था या 1954 में भूमिधर के रूप में मान्यता दी गई थी। पीठ ने कहा कि उत्तराधिकार के लिए लागू व्यक्तिगत कानून को 1954 के कानून के लागू होने के समय तक सीमित नहीं माना जा सकता। महिला की मृत्यु के समय लागू व्यक्तिगत कानून और उस समय उसके पास मौजूद अधिकार उत्तराधिकार तय करने में महत्वपूर्ण हैं। अदालत के अनुसार, चूंकि खजानो की मृत्यु 1973 में हुई थी, इसलिए उस समय उसके पास मौजूद पूर्ण स्वामित्व के आधार पर उत्तराधिकार का निर्धारण किया जाना था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुल्तान सिंह (मृतक) के कानूनी प्रतिनिधि बनाम दिल्ली सरकार के वित्त आयुक्त एवं अन्य मामले में अपील खारिज कर दी।