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पत्नी पर केरोसिन डालकर आत्महत्या के लिए उकसाया, मौत के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने पति की सजा बरकरार रखी
पत्नी पर केरोसिन डालकर उसे मरने के लिए कहने वाले पति को बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। अदालत ने कहा कि पत्नी ने खुद को आग लगाई, लेकिन उसे इस स्थिति तक पहुंचाने में पति की सक्रिय भूमिका थी। हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पति की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी।

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवसे ने 6 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपी का सक्रिय कृत्य और उसकी आपराधिक मंशा महत्वपूर्ण होती है। इस मामले में पति द्वारा पत्नी पर केरोसिन डालना और उसे मर जाने के लिए कहना उकसावे और भड़काने का स्पष्ट कृत्य था।
क्या था पूरा मामला?
मामला महाराष्ट्र के जलगांव जिले के अमलनेर तालुका के एकलहरे गांव का है। आरोपी विजय अमृत पाटिल की शादी सुरेखा से हुई थी। दंपति के एक बेटा और एक बेटी थे। मृतका के पिता प्रकाश ने शिकायत में आरोप लगाया था कि विजय को शराब पीने की लत थी। वह शराब के नशे में अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता था और मजदूरी करके कमाई गई उसकी रकम भी जबरन ले लेता था। परिवार के अनुसार, पति-पत्नी कुछ वर्षों तक रोजगार के लिए सूरत में भी रहे थे। वहां भी उनके बीच झगड़े होते थे। आरोप था कि आरोपी ने एक रिश्तेदार की शादी के दौरान भी सुरेखा को पीटा था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 25 जुलाई 2013 को विजय शराब के नशे में घर आया। उसने सुरेखा को गालियां दीं और दोनों के बीच विवाद हुआ। आरोप है कि इसके बाद विजय ने घर में रखे ड्रम से केरोसिन निकालकर पत्नी पर डाल दिया और उसे मर जाने के लिए कहा। इससे नाराज होकर सुरेखा ने खुद को आग लगा ली। वह लगभग 98 प्रतिशत तक जल गई। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद सुरेखा के पिता की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 498-A (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता), 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 504 (जानबूझकर अपमान करना) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया।
ट्रायल कोर्ट ने धारा 306 में ठहराया था दोषी
मामले की सुनवाई अमलनेर के अतिरिक्त सत्र न्यायालय में हुई। अभियोजन पक्ष ने आठ गवाहों के बयान पेश किए। इनमें मृतका के माता-पिता, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर, कार्यकारी मजिस्ट्रेट, चिकित्सा अधिकारी और जांच अधिकारी शामिल थे। विचारण न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषी ठहराया था। हालांकि, उसे धारा 498-A, 323, 504 और 506 के आरोपों से बरी कर दिया गया था। दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए विजय ने बॉम्बे हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की। उसका तर्क था कि पत्नी ने खुद को आग लगाई थी, इसलिए उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
पति ने कहा- पत्नी ने खुद लगाई आग, उकसाने का इरादा नहीं था
हाईकोर्ट में आरोपी के वकील ने दलील दी कि मृतका के माता-पिता की गवाही प्रत्यक्ष जानकारी पर आधारित नहीं थी। उन्होंने मृत्यु-पूर्व बयान की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। बचाव पक्ष ने कहा कि घटना के समय झगड़े और गुस्से के कारण मृतका ने खुद को आग लगाई थी। आरोपी ने उसे सीधे आग नहीं लगाई थी और न ही उसका इरादा पत्नी को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का था। इसलिए उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत अपराध साबित नहीं होता। दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील ने दोषसिद्धि का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि आरोपी ने पत्नी को पीटने के बाद उस पर केरोसिन डाला और उसे मर जाने के लिए कहा था। इसके बाद ही मृतका ने खुद को आग लगाई। राज्य के अनुसार, मृत्यु-पूर्व बयान भरोसेमंद था और विचारण न्यायालय ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था।
मृत्यु-पूर्व बयान को हाईकोर्ट ने माना विश्वसनीय
हाईकोर्ट ने मामले में मृतका के मृत्यु-पूर्व बयान पर विशेष ध्यान दिया। यह बयान विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दर्ज किया था। बयान दर्ज करने से पहले चिकित्सा अधिकारी ने मृतका की जांच की थी और उसे बयान देने के लिए सक्षम बताया था। मृतका ने अपने बयान में बताया था कि 25 जुलाई 2013 को सुबह लगभग 11:30 बजे उसका पति शराब के नशे में घर आया। उसने बिना किसी कारण उसे गालियां दीं। जब उसने इसका विरोध किया, तो पति ने उस पर केरोसिन डाल दिया और मर जाने के लिए कहा। इसके बाद उसने गुस्से में खुद को आग लगा ली। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृत्यु-पूर्व बयान पर पैर के अंगूठे के निशान का सत्यापन नहीं कराया गया था। बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में कुछ कमियां भी थीं। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि बयान की शुरुआत और अंत में डॉक्टर का प्रमाणन मौजूद था। चिकित्सा अधिकारी ने भी इसकी पुष्टि की थी। केवल पैर के अंगूठे के निशान का सत्यापन नहीं होने से पूरे बयान को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि बयान घटना के दिन ही दर्ज किया गया था।
केरोसिन डालना और मरने के लिए कहना सक्रिय उकसावा
हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए आरोपी की आपराधिक मंशा और ऐसा सक्रिय या प्रत्यक्ष कृत्य महत्वपूर्ण है, जिसने मृतक को आत्महत्या की ओर धकेला हो। न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवसे ने पाया कि इस मामले में आरोपी ने केवल झगड़ा या गाली-गलौज ही नहीं की थी। उसने पत्नी को पीटने के बाद उस पर केरोसिन डाला और फिर उसे मर जाने के लिए कहा। अदालत के अनुसार, केरोसिन डालना आरोपी की सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है। इसके बाद मृतका को मरने के लिए कहना उकसावे और भड़काने का स्पष्ट कृत्य था। इन परिस्थितियों में आरोपी की आपराधिक मंशा भी सामने आती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृतका ने भले ही गुस्से में खुद को आग लगाई हो, लेकिन आरोपी ने अपने कृत्यों से उसे ऐसी स्थिति में पहुंचाया था, जिसमें उसने यह चरम कदम उठाया। अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 107 के स्पष्टीकरण 2 का उल्लेख करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों में आरोपी पति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज की
हाईकोर्ट ने कहा कि विचारण न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया था और आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषी ठहराने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की थी। अदालत को निचली अदालत के फैसले में कोई अवैधता या विकृति नहीं मिली। इसी आधार पर न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवसे ने विजय अमृत पाटिल की आपराधिक अपील खारिज कर दी और आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी। मामले में अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता परेश बी. पाटिल और महाराष्ट्र राज्य की ओर से सहायक सरकारी वकील वी. वी. जहागीरदार पेश हुए थे।
