law-order

कैंसर पीड़ित बच्चे के खून के लिए ₹9,000 वसूले, आयुष्मान पैनल से बाहर अस्पताल को हाईकोर्ट से राहत नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कैंसर पीड़ित दो महीने के बच्चे को चढ़ाए गए खून की दो यूनिट के लिए ₹9,000 वसूलने के मामले में अस्पताल को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने आयुष्मान भारत योजना के पैनल से अस्पताल को हटाने के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि योजना के तहत इलाज के दौरान अस्पताल की ओर से गंभीर प्रक्रियागत खामियां प्रथम दृष्टया सामने आई हैं।

Sonali10 अक्टू. 2026, 03:49 PM IST
खबर शेयर करें:
कैंसर पीड़ित बच्चे के खून के लिए ₹9,000 वसूले, आयुष्मान पैनल से बाहर अस्पताल को हाईकोर्ट से राहत नहीं

इलाहाबाद: 

यह मामला मुरादाबाद के सर्जिमेड हॉस्पिटल (Surgimed Hospital) से जुड़ा है। अस्पताल आयुष्मान भारत योजना के तहत मरीजों का इलाज करने के लिए सरकारी पैनल में शामिल था। राज्य की पैनल संबंधी समिति ने अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 19 अगस्त 2026 को उसका पैनल समाप्त करने का आदेश दिया था। अस्पताल को इससे पहले 18 जून 2026 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। समिति के अनुसार, ब्लड कैंसर से पीड़ित दो महीने के बच्चे को खून की दो यूनिट चढ़ाई गई थीं, जिनके लिए अस्पताल ने कथित तौर पर ₹9,000 वसूले। योजना के तहत संबंधित उपचार निःशुल्क उपलब्ध कराया जाना था। मामले में एक दूसरी महत्वपूर्ण खामी भी सामने आई। बच्चे को खून चढ़ाने की प्रक्रिया का विवरण इलाज करने वाले डॉक्टर ने बेड हेड टिकट (Bed Head Ticket यानी मरीज के इलाज का लिखित रिकॉर्ड) में दर्ज नहीं किया था। समिति ने कहा कि आईसीयू में भर्ती मरीज के उपचार के दौरान यह विवरण दर्ज करना अनिवार्य था।

अस्पताल के डॉक्टर ने भी स्वीकार की चूक

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान गौर किया कि अस्पताल की ओर से राज्य की पैनल संबंधी समिति के सामने पेश हुए डॉक्टर ने प्रक्रियागत चूक स्वीकार की थी।

अदालत ने माना कि समिति के आदेश में कारणों का विस्तृत उल्लेख भले ही नहीं था, लेकिन इससे रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों की अहमियत कम नहीं हो जाती। पीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है कि अस्पताल ने योजना को लागू करने और उसके तहत इलाज के दौरान जरूरी प्रोटोकॉल का पालन करने में गंभीर कमियां बरतीं।

पैनल से हटाना पेशे पर रोक नहीं: हाईकोर्ट

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आयुष्मान भारत योजना या SACHIS के पैनल से हटाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि अस्पताल या उसके डॉक्टरों को अपना पेशा जारी रखने से रोक दिया गया है। अस्पताल और उसके डॉक्टर अपने पास इलाज के लिए आने वाले मरीजों को सेवाएं देना जारी रख सकते हैं। अदालत ने इसकी तुलना ऐसी स्थिति से की, जिसमें कोई मरीज किसी डॉक्टर पर भरोसा नहीं रहने के कारण उसकी सेवाएं लेना बंद कर देता है।

पैनल में शामिल होना कानूनी अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना के पैनल में शामिल होना ऐसा कानूनी अधिकार नहीं है, जिसे अदालत के जरिए अनिवार्य रूप से लागू कराया जा सके। यह राज्य की ओर से अस्पतालों को दिया जाने वाला विशेषाधिकार है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य को अस्पतालों को पैनल में शामिल करने के मामले में भेदभाव नहीं करना चाहिए। लेकिन इस मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड पर अस्पताल की ओर से योजना के नियमों और उपचार संबंधी आवश्यक प्रक्रियाओं के पालन में गंभीर कमियां प्रथम दृष्टया दिखाई दीं।

हाईकोर्ट ने खारिज की अस्पताल की याचिका

अस्पताल ने राज्य की पैनल संबंधी समिति के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने समिति के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और अस्पताल की याचिका खारिज कर दी। यह आदेश जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सर्जिमेड हॉस्पिटल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य मामले में पारित किया। मामले का विवरण Writ-C No. 39120 of 2026 के रूप में सामने आया है। अदालत के फैसले से स्पष्ट है कि सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत इलाज करने वाले अस्पतालों को निर्धारित प्रक्रियाओं और प्रोटोकॉल का पालन करना होगा। पैनल में बने रहने का अधिकार न होने के बावजूद, राज्य को ऐसे मामलों में निष्पक्ष और रिकॉर्ड पर आधारित निर्णय लेना होगा।