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POCSO मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 11 साल की बच्ची से यौन अपराध के दोषी चार्मिंग रूपोन को किया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय के POCSO मामले में 11 वर्षीय बच्ची से यौन अपराध के दोषी ठहराए गए Charming Rupon को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता और उसकी चचेरी बहन आरोपी की पहचान नहीं कर सकीं, FIR करीब 10 दिन बाद दर्ज हुई और अहम शिक्षिका को गवाह नहीं बनाया गया। इन कमियों के बीच आरोपी की दोषसिद्धि कायम रखना सुरक्षित नहीं था।

नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय के एक POCSO मामले में दोषसिद्धि को रद्द करते हुए आरोपी Charming Rupon को बरी कर दिया है। आरोपी पर 11 वर्षीय बौद्धिक दिव्यांग बच्ची से यौन अपराध करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने उसे POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर कैद और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। मेघालय हाईकोर्ट ने भी 29 मार्च 2022 को उसकी अपील खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष को आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करना होता है। अदालत ने माना कि इस मामले में गवाहों की गवाही, FIR में महत्वपूर्ण तथ्यों के अभाव, आरोपी की पहचान को लेकर संदेह और महत्वपूर्ण गवाह की गैर-मौजूदगी को देखते हुए दोषसिद्धि कायम रखना सुरक्षित नहीं था।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार 28 मई 2015 को पीड़िता की मां किसी काम से घर से बाहर गई थी और बच्ची घर पर अकेली थी। मां ने कथित तौर पर घर से निकलते समय आरोपी को घर से लगे बगीचे में शहतूत के पत्ते तोड़ते हुए देखा था। आरोप था कि इसी दौरान आरोपी घर में गया और बच्ची के साथ जबरन यौन अपराध किया।
इसके बाद बच्ची अपनी चचेरी बहन Ms. J के घर गई और रात वहीं रुकी। अभियोजन के मुताबिक बच्ची ने अपनी चचेरी बहन को घटना के बारे में बताया और अगले दिन चचेरी बहन ने बच्ची की मां को इसकी जानकारी दी। हालांकि मां ने बच्ची से पूछताछ की तो बच्ची ने घटना की पुष्टि नहीं की।
शिक्षिका से बताने के बाद दर्ज हुई FIR
मामला कई दिनों तक पुलिस तक नहीं पहुंचा। 7 जून 2015 को बच्ची ने स्कूल में अपनी शिक्षिका Ms. Princely को घटना की जानकारी दी। शिक्षिका ने उसके माता-पिता को बताया। इसके बाद 8 जून 2015 को बच्ची की मां ने Khliehriat पुलिस थाने में FIR दर्ज कराई। FIR में कहा गया था कि आरोपी ने उसकी 11 वर्षीय बेटी के साथ 28 मई 2015 को शाम करीब 5 बजे बलात्कार किया। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यह देखा कि FIR घटना के करीब 10 दिन बाद दर्ज हुई और उसमें कई ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य नहीं थे, जिन पर बाद में मुकदमे के दौरान अभियोजन ने भरोसा किया।
मेडिकल जांच में चोटें मिलीं, लेकिन आरोपी से नहीं जुड़ पाया मामला
FIR दर्ज होने के उसी दिन पीड़िता की मेडिकल जांच हुई। मेडिकल साक्ष्य में उसके जननांग क्षेत्र में चोटें दर्ज की गईं और डॉक्टर ने कहा कि यौन हमला किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि FIR में लगभग 10 दिन की देरी के कारण जांच के दौरान कोई वैज्ञानिक या सीरोलॉजिकल सबूत हासिल नहीं किया जा सका।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि मेडिकल अधिकारियों की गवाही का प्रभावी जिरह के जरिए परीक्षण ही नहीं हो सका। एक मेडिकल अधिकारी के बयान के समय बचाव पक्ष का वकील मौजूद नहीं था और दूसरे मेडिकल अधिकारी से बचाव पक्ष को जिरह का अवसर ही नहीं दिया गया। इसलिए कोर्ट ने दोनों मेडिकल गवाहों की गवाही को साक्ष्य के रूप में पढ़ने योग्य नहीं माना।
पीड़िता और चचेरी बहन कोर्ट में आरोपी को पहचान नहीं सकीं
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल आरोपी की पहचान को लेकर उठा। पीड़िता की चचेरी बहन ने कोर्ट में कहा कि वह आरोपी को नहीं जानती और उसका चेहरा याद नहीं है। उसने यह भी स्वीकार किया कि आरोपी का नाम उसे पीड़िता की मां ने बताया था। पीड़िता ने भी जिरह के दौरान कहा कि उसे आरोपी का चेहरा याद नहीं है और वह उसे पहचान नहीं सकती। उसने यह भी कहा कि आरोपी का नाम उसकी मां ने उसे बताया था। पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया कि कोर्ट में बयान देने से पहले उसने Special Public Prosecutor से मुलाकात की थी और उसे बताया गया था कि कोर्ट में क्या कहना है। सुप्रीम कोर्ट ने इन परिस्थितियों को गंभीरता से लिया और कहा कि इससे गवाही के tutored (सिखाई गई/प्रभावित) होने की आशंका पैदा होती है।
FIR में आरोपी को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य क्यों नहीं थे?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि FIR कोई encyclopaedia (घटना की हर छोटी-बड़ी जानकारी वाली रिपोर्ट) नहीं होती, लेकिन यदि बाद में जिस तथ्य को आरोपी के खिलाफ महत्वपूर्ण आधार बनाया जाता है, वह शुरुआती FIR में पूरी तरह गायब हो, तो उसकी गंभीरता से जांच जरूरी है। अदालत ने पाया कि मां ने बाद में कोर्ट में कहा कि उसने आरोपी को घटना से पहले घर के पास बगीचे में देखा था। लेकिन यह महत्वपूर्ण तथ्य FIR में नहीं था। इसी तरह यह दावा भी FIR में नहीं था कि चचेरी बहन ने घटना के अगले दिन मां को कथित यौन हमले की जानकारी दी थी। कोर्ट के मुताबिक, जब FIR करीब 10 दिन बाद दर्ज हुई थी, तब इन महत्वपूर्ण तथ्यों के FIR में न होने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।
महत्वपूर्ण शिक्षिका को कोर्ट में क्यों नहीं बुलाया?
सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन की एक और बड़ी कमी पर ध्यान दिया। अभियोजन की कहानी के अनुसार बच्ची ने सबसे पहले स्कूल की शिक्षिका Ms. Princely को घटना बताई थी और शिक्षिका द्वारा माता-पिता को जानकारी देने के बाद FIR दर्ज हुई। इसके बावजूद शिक्षिका को ट्रायल में गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया। अभियोजन ने उनकी गैर-मौजूदगी का कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षिका इस मामले की महत्वपूर्ण गवाह थीं, क्योंकि वह बता सकती थीं कि बच्ची ने वास्तव में उन्हें क्या बताया था और FIR दर्ज होने में देरी क्यों हुई। ऐसे महत्वपूर्ण गवाह को बिना किसी उचित कारण के पेश नहीं करना अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (adverse inference) का आधार बन सकता है।
मां के बयान पर भी सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता की मां के आचरण को भी अस्वाभाविक माना। कोर्ट ने कहा कि यदि चचेरी बहन ने अगले ही दिन मां को बताया था कि उसकी मानसिक रूप से कमजोर बेटी के साथ यौन हमला हुआ है, तो मां से अपेक्षा थी कि वह मामले को गंभीरता से लेती और बच्ची की शारीरिक स्थिति की जांच कराती।
लेकिन मां ने तत्काल पुलिस से संपर्क नहीं किया। यहां तक कि बच्ची के आरोप की पुष्टि नहीं करने के कारण उसने कथित घटना को गंभीरता से नहीं लिया। कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों से अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
'Last seen' की दलील भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि मां ने आरोपी को घटना से पहले घर के पास देखा था, इसलिए Indian Evidence Act की धारा 106 के तहत घटना की विशेष जानकारी आरोपी के पास थी और उसे सफाई देनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि मां ने सिर्फ आरोपी को बगीचे में शहतूत के पत्ते तोड़ते हुए देखा था। उसने आरोपी और बच्ची को एक साथ नहीं देखा था। इसलिए यह 'last seen' (आखिरी बार साथ देखे जाने) का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तथ्य FIR में मौजूद नहीं था और बाद में ट्रायल के दौरान सामने आया। इसलिए इस आधार पर आरोपी पर सबूत का बोझ नहीं डाला जा सकता।
आरोपी का अलिबी भी सुप्रीम कोर्ट ने माना विश्वसनीय
आरोपी ने अपने बचाव में alibi (घटना के समय किसी दूसरी जगह मौजूद होने का दावा) पेश किया। उसने खुद गवाही दी और तीन अन्य गवाहों को भी पेश किया। इसके समर्थन में दस्तावेज भी पेश किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष की ओर से पेश मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों से आरोपी का यह बचाव विश्वसनीय नजर आता है कि वह संपत्ति से जुड़े लेनदेन के सिलसिले में दूसरे गांव गया था। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने इस बचाव के साक्ष्य को उचित तरीके से नहीं परखा और उसे हल्के में खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने पूरे मामले की परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए कहा कि पीड़िता की मां का अस्वाभाविक आचरण, FIR दर्ज करने में करीब 10 दिन की देरी, पीड़िता और उसकी चचेरी बहन द्वारा अदालत में आरोपी की पहचान न कर पाना, आरोपी के रिश्ते को लेकर विरोधाभासी बयान, महत्वपूर्ण शिक्षिका की गवाही न कराया जाना और आरोपी की ओर से पेश अलिबी—इन सभी परिस्थितियों ने अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा किया। अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों के सामूहिक प्रभाव को देखते हुए आरोपी की दोषसिद्धि कायम रखना सुरक्षित नहीं है। अभियोजन आरोपी का अपराध beyond reasonable doubt (उचित संदेह से परे) साबित करने में विफल रहा।
10 साल की सजा रद्द, आरोपी बरी
सुप्रीम कोर्ट ने 7 दिसंबर 2021 को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 साल की कठोर कैद और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा तथा 29 मार्च 2022 को मेघालय हाईकोर्ट द्वारा दोषसिद्धि बरकरार रखने वाला फैसला रद्द कर दिया। अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली।
