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लंबित आपराधिक मामले के आधार पर पुलिस कांस्टेबल की नियुक्ति खारिज नहीं कर सकते अधिकारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला रद्द किया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले में अभ्यर्थी की उम्मीदवारी खारिज करने के फैसले को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा 5 अप्रैल 2025 को जारी निर्देश, सरकारी सेवा में पहली नियुक्ति के समय चरित्र प्रमाणपत्र जारी करने से संबंधित 28 अप्रैल 1958 के सरकारी आदेश को निष्प्रभावी नहीं कर सकते।

प्रयागराज:
आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती में चयनित अभ्यर्थी की नियुक्ति रोकने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ ने अभ्यर्थी का अभ्यावेदन खारिज करने वाला आदेश निरस्त कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस महानिदेशक (DGP) के 5 अप्रैल 2025 के निर्देश सरकारी सेवा में पहली नियुक्ति के समय चरित्र सत्यापन से संबंधित 28 अप्रैल 1958 के सरकारी आदेश को दरकिनार नहीं कर सकते। अदालत ने नियुक्ति प्राधिकारी को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।
चयन सूची में 90वें स्थान पर था अभ्यर्थी, फिर भी नहीं मिली जॉइनिंग
मामला उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल सिविल पुलिस सीधी भर्ती-2023 से जुड़ा है। अभ्यर्थी रवि कुमार गुप्ता चयन सूची में 90वें स्थान पर था। उसका अंतिम चयन हो चुका था और उसे संयुक्त प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए प्रयागराज जिला आवंटित किया गया था। लेकिन चरित्र सत्यापन के दौरान उसके खिलाफ लंबित आपराधिक मामले की जानकारी सामने आने के बाद उसे नियुक्ति नहीं दी गई। अभ्यर्थी के खिलाफ बलिया जिले के दुबहड़ पुलिस थाने में वर्ष 2022 में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 323, 324, 352, 452 और 504 के तहत आरोप लगाए गए थे। मामले में 15 नवंबर 2022 को आरोपपत्र दाखिल किया गया था। अभ्यर्थी ने अपनी ओर से इस आपराधिक मामले की जानकारी हलफनामे में दी थी। उसका तर्क था कि उसने कोई तथ्य नहीं छिपाया, इसलिए केवल मामला लंबित होने के आधार पर उसकी नियुक्ति रोकना उचित नहीं है।
जिलाधिकारी की रिपोर्ट के बाद रोक दी गई नियुक्ति
राज्य सरकार के अनुसार, बलिया के जिलाधिकारी ने 13 जून 2025 और 11 जुलाई 2025 को चरित्र सत्यापन के पक्ष में सिफारिश नहीं की थी। अभियोजन विभाग के संयुक्त निदेशक ने भी मामले को नैतिक अधमता से जुड़ा माना था। इसके बाद प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट के पुलिस उपायुक्त (मुख्यालय) ने 25 नवंबर 2025 को अभ्यर्थी का अभ्यावेदन खारिज कर दिया। इस फैसले को अभ्यर्थी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
DGP के निर्देश पुराने सरकारी आदेश पर हावी नहीं हो सकते
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि पुलिस महानिदेशक द्वारा 5 अप्रैल 2025 को जारी निर्देश, 28 अप्रैल 1958 के सरकारी आदेश को निष्प्रभावी नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि पहली सरकारी नियुक्ति के समय चरित्र प्रमाणपत्र जारी करने के संबंध में 1958 का सरकारी आदेश प्रभावी बना हुआ है। कोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी के रवैये पर भी सवाल उठाया। अदालत के अनुसार, संबंधित अधिकारी केवल जिला स्तरीय समिति या अन्य अधिकारियों की सिफारिश को स्वीकार करके अभ्यर्थी की उम्मीदवारी खारिज नहीं कर सकता। उसे लागू नियमों और मामले की वास्तविक परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेख
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम भारत संघ (Avtar Singh v. Union of India) मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि सरकारी नौकरी में चरित्र सत्यापन के दौरान आपराधिक मामले की जानकारी, आरोपों की प्रकृति और संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। हर मामले में केवल आपराधिक प्रकरण लंबित होने को नियुक्ति से इनकार करने का स्वतः आधार नहीं माना जा सकता। वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि प्राथमिकी एक विवाद से जुड़ी थी और उसमें अभ्यर्थी की विशिष्ट भूमिका का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। अभ्यर्थी ने आपराधिक मामले की जानकारी भी छिपाई नहीं थी।
नियुक्ति का सीधा आदेश नहीं, नए सिरे से विचार करने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 25 नवंबर 2025 को अभ्यर्थी का अभ्यावेदन खारिज करने वाला आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने संबंधित नियुक्ति प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट की टिप्पणियों और लागू सरकारी आदेशों को ध्यान में रखते हुए मामले पर नए सिरे से निर्णय ले। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि अभ्यर्थी को तत्काल नियुक्ति मिल गई है। हाईकोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी को उसकी उम्मीदवारी पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया है।
