law-order
बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बहू से कपड़े धुलवाना और बर्तन साफ करवाना क्रूरता नहीं, 6 परिजनों की FIR रद्द
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि बहू से कपड़े धोने और बर्तन साफ करने जैसे घरेलू काम कराने भर से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध नहीं बनता। जस्टिस अभय मंत्री की एकल पीठ ने इस आरोप के आधार पर परिवार के छह सदस्यों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी।

यह मामला वैवाहिक विवाद और महिला के साथ कथित क्रूरता के आरोपों से जुड़ा था। शिकायत में ससुराल पक्ष के सदस्यों पर बहू से घर के काम कराने जैसे आरोप लगाए गए थे। इनमें कपड़े धोना और बर्तन साफ करना जैसे रोजमर्रा के घरेलू काम शामिल थे। मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर पीठ ने आरोपों की प्रकृति पर विचार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बहू से घरेलू काम करने की अपेक्षा रखना अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता। केवल ऐसे आरोपों के आधार पर ससुराल के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है। अदालत ने इस मामले में परिवार के छह सदस्यों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया।
क्या है IPC की धारा 498A?
भारतीय दंड संहिता की धारा 498A का इस्तेमाल विवाहित महिला के साथ उसके पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता किए जाने के मामलों में किया जाता था। इस प्रावधान का उद्देश्य महिलाओं को वैवाहिक घर में होने वाली गंभीर प्रताड़ना से कानूनी सुरक्षा देना था। इस धारा के तहत क्रूरता में ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण शामिल हो सकता है, जिससे महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर होने की आशंका हो या उसके जीवन, अंग अथवा शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा हो। इसके अलावा, संपत्ति या मूल्यवान वस्तुओं की गैरकानूनी मांग पूरी कराने के लिए महिला को परेशान करना भी इसके दायरे में आ सकता है। हालांकि, वैवाहिक घर में होने वाला हर विवाद या घरेलू काम को लेकर मतभेद अपने आप में इस धारा के तहत अपराध नहीं बन जाता। आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह तय किया जाता है कि संबंधित कानूनी प्रावधान लागू होते हैं या नहीं।
छह परिजनों के खिलाफ FIR रद्द
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में परिवार के छह सदस्यों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते हुए घरेलू काम कराने के आरोप और कानूनी रूप से दंडनीय क्रूरता के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत के इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि बहू के साथ किसी भी तरह की प्रताड़ना को नजरअंदाज किया जा सकता है। यदि घरेलू काम कराने के साथ हिंसा, गंभीर मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना अथवा गैरकानूनी मांगों से जुड़े आरोप हों, तो उनकी जांच तथ्यों और लागू कानून के अनुसार की जा सकती है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि उपलब्ध रिपोर्ट में मामले के सभी तथ्य, शिकायत में लगाए गए अन्य आरोप और अदालत के विस्तृत तर्क उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए फैसले को केवल घरेलू काम कराने के आरोप और धारा 498A के तहत क्रूरता के प्रश्न के संदर्भ में समझना चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानून के इस्तेमाल से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बहू से कपड़े धुलवाने या बर्तन साफ करवाने जैसे आरोपों के आधार पर ससुराल पक्ष के सदस्यों को धारा 498A के तहत अभियोजन का सामना नहीं कराया जा सकता।
