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POCSO केस की जांच से नाराजगी भर से 7 सरकारी अफसरों पर कार्रवाई नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की अपील

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि SC/ST एक्ट की धारा 4 के तहत पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए केवल जांच से असंतुष्टि या संबंधित धाराएं नहीं लगाने की शिकायत पर्याप्त नहीं है। अधिकारियों की ओर से जानबूझकर कानूनी कर्तव्य की अनदेखी साबित करना जरूरी है। अदालत ने सात सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली महिला की अपील खारिज कर दी।

Sonali16 अक्टू. 2026, 03:56 PM IST
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POCSO केस की जांच से नाराजगी भर से 7 सरकारी अफसरों पर कार्रवाई नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की अपील

मामला गाजियाबाद की रहने वाली गुड्डो नामक अनुसूचित जाति की महिला से जुड़ा है। महिला के अनुसार, वर्ष 2020 में उसकी नाबालिग बेटी एक दंपती के घर घरेलू सहायिका के रूप में काम करती थी और इसी दौरान वह लापता हो गई। महिला ने आरोप लगाया कि बेटी के बरामद होने के बाद उसकी मेडिकल जांच में दुष्कर्म और गर्भावस्था की पुष्टि हुई थी। महिला का आरोप था कि उसने 15 मार्च 2020 को कौशांबी पुलिस थाने के थाना प्रभारी को लिखित शिकायत और जाति प्रमाणपत्र दिया था, लेकिन पुलिस ने उचित कार्रवाई नहीं की। उसने जांच अधिकारी पर पक्षपातपूर्ण जांच करने, पीड़िता के बयानों के बावजूद SC/ST एक्ट की संबंधित धाराएं नहीं जोड़ने और वास्तविक आरोपियों के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि मामले की निगरानी करने वाले अधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उसकी शिकायतों की निष्पक्ष जांच नहीं की। इन आरोपों के आधार पर उसने सात सरकारी अधिकारियों के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 4 के तहत कार्रवाई शुरू करने की मांग की थी। हालांकि, गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद महिला ने अधिनियम की धारा 14-A(1) के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण किया और पाया कि महिला की इस दलील में तथ्यात्मक विरोधाभास था कि पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की थी। अदालत के अनुसार, महिला की लिखित शिकायत के आधार पर 7 फरवरी 2020 को ही अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 के तहत FIR दर्ज की गई थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि जांच अधिकारी ने शिकायतकर्ता, पीड़िता और अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए थे। इसके अलावा घटनास्थल का निरीक्षण किया गया और एक आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। मामले में POCSO एक्ट के तहत मुकदमे की सुनवाई भी जारी थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी द्वारा किसी विशेष कानूनी धारा को नहीं जोड़ना अपने आप में SC/ST एक्ट की धारा 4 के तहत जानबूझकर कर्तव्य की अनदेखी साबित नहीं करता। इसके लिए यह दिखाना होगा कि अधिकारी पर कानून के तहत कोई स्पष्ट दायित्व था और उसने जानबूझकर उसका पालन नहीं किया।

सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए जरूरी शर्त

अदालत ने कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 4 सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने पर दंड का प्रावधान करती है। हालांकि, इसके तहत कार्रवाई के लिए केवल शिकायतकर्ता की नाराजगी या संबंधित आपराधिक मामले में FIR और आरोपपत्र का मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। पीठ ने धारा 4 के प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने से पहले प्रशासनिक जांच और उसकी सिफारिश की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने महिला की अपील खारिज कर दी और सात सरकारी अधिकारियों के खिलाफ धारा 4 के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से इनकार करने वाले विशेष अदालत के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया।