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बुजुर्ग विधवा मां को छोड़ने का दबाव पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति को दी तलाक की मंजूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़कर अलग घर बसाने के लिए पति पर लगातार दबाव बनाना मानसिक क्रूरता है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की डिक्री जारी की।

Sonali16 अक्टू. 2026, 03:56 PM IST
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बुजुर्ग विधवा मां को छोड़ने का दबाव पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति को दी तलाक की मंजूरी

मामला हरिश दीपांकर तिवारी बनाम श्रीमती हीरेश तिवारी से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, दोनों की शादी 17 फरवरी 2000 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी और उनकी दो बेटियां हैं। पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था और उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में अपनी 68 वर्षीय विधवा मां के साथ रहता था। पति का आरोप था कि शादी के शुरुआती समय से ही पत्नी उस पर मां से अलग रहने और पत्नी के मायके इटावा जाकर बसने का दबाव बनाती थी। उसके मुताबिक, समय के साथ यह मांग बढ़ती गई। उसने पत्नी पर अपनी मां के साथ अपमानजनक व्यवहार करने और झूठे दहेज मामलों में फंसाने की धमकी देने के आरोप भी लगाए थे। ये पति के लगाए आरोप थे, जिनका पत्नी ने अदालत में विरोध नहीं किया।

पत्नी 2012 में मायके चली गई थी

पति के अनुसार, 6 जुलाई 2012 को पत्नी अपने मायके चली गई थी। उसने आरोप लगाया कि पत्नी अपने साथ गहने, उसकी मां के कुछ गहने और 50 हजार रुपये नकद भी ले गई थी। पति ने यह भी दावा किया कि 3 मार्च 2015 को पत्नी ने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया। इसके बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली यानी साथ रहने का अधिकार दिलाने की मांग की। वैकल्पिक रूप से उसने धारा 13 के तहत तलाक की मांग भी की।

फैमिली कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी

मैनपुरी की फैमिली कोर्ट ने 12 जुलाई 2017 को पति की याचिका खारिज कर दी थी। निचली अदालत ने गहने और नकदी ले जाने के आरोपों पर संदेह जताया था। अदालत के अनुसार, पत्नी को सामान ले जाते हुए किसी ने नहीं देखा था, पति की मां की गवाही भी पेश नहीं की गई थी और गहनों के बिल भी उपलब्ध नहीं थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने वैवाहिक विवाद को चोरी के आपराधिक मुकदमे की तरह परखा और मानसिक क्रूरता से जुड़े साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन नहीं किया। हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि निचली अदालत ने मामले में मुद्दे निर्धारित किए बिना ही याचिका खारिज कर दी थी।

मां को छोड़ने का दबाव गहनों के आरोपों से अलग था

हाईकोर्ट ने माना कि पति-पत्नी के बीच गहने और नकदी से जुड़े आरोप अपने आप में गंभीर थे और ऐसे आरोप वैवाहिक संबंधों में भरोसे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की मानसिक क्रूरता की शिकायत केवल गहने और नकदी से जुड़े आरोपों पर आधारित नहीं थी। पति ने अपनी याचिका में अलग रहने के लिए लगातार बनाए जा रहे दबाव और मां के साथ कथित दुर्व्यवहार का भी उल्लेख किया था। अदालत के सामने पति की गवाही और अन्य गवाहों के बयान चुनौती के बिना रहे। पत्नी सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हुई और उसके पक्ष से पति की गवाही का प्रतिपरीक्षण भी नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में दूसरे पक्ष के पेश नहीं होने से अपने आप फैसला नहीं दिया जा सकता। याचिकाकर्ता को विश्वसनीय साक्ष्यों से अपना मामला साबित करना होता है। हालांकि, जब गवाही में कही गई महत्वपूर्ण बातों को चुनौती नहीं दी जाती, तो अदालत उनके साक्ष्यगत महत्व पर विचार कर सकती है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के मन में झूठी शिकायत दर्ज होने का डर पैदा करना मानसिक रूप से परेशान कर सकता है। यदि ऐसे आरोप सही साबित होते हैं, तो वे भी मानसिक क्रूरता के निर्धारण में प्रासंगिक हो सकते हैं।

हाईकोर्ट ने विवाह-विच्छेद की डिक्री जारी की

हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का फैसला और डिक्री रद्द कर दी। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की मांग मंजूर कर ली। चूंकि विवाह-विच्छेद की डिक्री जारी हो गई, इसलिए साथ रहने के अधिकार की वैकल्पिक मांग पर अलग से राहत देने की आवश्यकता नहीं रही। पति ने स्थायी गुजारा भत्ता (परमानेंट एलिमनी) की मांग नहीं की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत उचित आवेदन देकर स्थायी गुजारा भत्ता मांगने का विकल्प खुला रखा। यह फैसला हर वैवाहिक विवाद में अलग रहने की मांग को अपने आप मानसिक क्रूरता नहीं मानता। इस मामले में हाईकोर्ट ने पति के आरोपों, उपलब्ध गवाही, पत्नी की अनुपस्थिति और फैमिली कोर्ट के फैसले में पाई गई कमियों पर विचार करने के बाद विवाह-विच्छेद का आदेश दिया।