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गैर-हिंदू धर्म अपनाने के बाद पुरानी जाति के आधार पर आरक्षण नहीं, सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को कहा कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति केवल अपनी पुरानी जाति के आधार पर पिछड़ा वर्ग आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

Sonali16 अक्टू. 2026, 03:52 PM IST
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गैर-हिंदू धर्म अपनाने के बाद पुरानी जाति के आधार पर आरक्षण नहीं, सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 15 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने मात्र से किसी व्यक्ति को तमिलनाडु के सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में सदस्यता नहीं मिल जाती। पहले की जातिगत पहचान को नए धार्मिक और सामाजिक ढांचे में अपने आप स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। यह मामला तमिलनाडु सरकार के वर्ष 2024 के सरकारी आदेश से जुड़ा है। इस आदेश के तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदायों (Denotified Communities) और अनुसूचित जाति (SC) से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को BC (Muslim) श्रेणी में शामिल करने और सात अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की गई थी, ताकि वे आरक्षण का लाभ उठा सकें। मामले की शुरुआत समीर अहमद की याचिका से हुई, जो पहले परमासिवम के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम लेब्बई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा, लेकिन तहसीलदार ने उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया। मद्रास हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार के 2024 के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब सरकार की अपील खारिज कर दी है।

पुरानी जाति के आधार पर नई श्रेणी में सदस्यता नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को पहले की सामाजिक व्यवस्था में मिले पिछड़ेपन के आधार पर दूसरी धार्मिक व्यवस्था के किसी अलग अधिसूचित पिछड़ा वर्ग समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, निजी धार्मिक संस्था भी किसी व्यक्ति की आरक्षण पात्रता को अंतिम रूप से निर्धारित नहीं कर सकती। Supreme Court, सुप्रीम कोर्ट, धर्म परिवर्तन आरक्षण, पिछड़ा वर्ग आरक्षण, मुस्लिम पिछड़ा वर्ग, जाति प्रमाण पत्र, मद्रास हाईकोर्ट, तमिलनाडु सरकार, Article 16(4), संविधान, BC Muslim Reservation, Caste Reservation, Conversion and Reservationपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 16(4) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का लाभ संबंधित संवैधानिक और कानूनी शर्तों के अधीन है। धर्म परिवर्तन से पहले की जातिगत पहचान अपने आप किसी दूसरे समुदाय में आरक्षण की पात्रता का आधार नहीं बन सकती।

अनुसूचित जाति के दर्जे पर भी अदालत की टिप्पणी

अदालत ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्म मानने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। ऐसे धर्म में परिवर्तन करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है और उस दर्जे पर निर्भर लाभों का दावा नहीं किया जा सकता। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति गैर-हिंदू धर्म अपनाने के बाद दोबारा हिंदू धर्म में लौटता है, तो आरक्षण की पात्रता स्वतः बहाल नहीं होगी। इसके लिए तथ्यों की स्वतंत्र जांच करनी होगी और यह निर्धारित करना होगा कि उसकी मूल जातिगत पहचान वास्तव में पुनः स्थापित हुई है या नहीं तथा संबंधित कानूनी शर्तें पूरी होती हैं या नहीं। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्म परिवर्तन के बाद केवल पुरानी जाति का हवाला देकर किसी अन्य अधिसूचित पिछड़ा वर्ग समुदाय में शामिल होने और आरक्षण का लाभ लेने का दावा नहीं किया जा सकता।