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छह साल के बच्चे की पसंद पर नहीं, उसके भविष्य पर होगा फैसला; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां को दिलाई कस्टडी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह साल के बच्चे की कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि मां से दूर रखे गए कम उम्र के बच्चे की पसंद को कस्टडी तय करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है और केवल उसकी देखभाल करने से दादी का दावा मां से बेहतर नहीं हो जाता।

Sonali17 अक्टू. 2026, 05:34 PM IST
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छह साल के बच्चे की पसंद पर नहीं, उसके भविष्य पर होगा फैसला; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां को दिलाई कस्टडी

यह मामला आगरा की एक महिला और उसके बेटे की कस्टडी से जुड़ा है। महिला के पति की वर्ष 2020 में मृत्यु हो गई थी। उस समय बच्चा केवल आठ महीने का था। इसके बाद बच्चा अपनी दादी के पास रहने लगा। महिला का आरोप था कि बीमा क्लेम के बहाने उससे खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए और बाद में उनका इस्तेमाल कथित तौर पर एक समझौता तैयार करने के लिए किया गया, जिसके तहत बच्चा दादी के पास रहने लगा। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि इसके बाद उसे अपने बेटे से मिलने नहीं दिया गया। बच्चे की कस्टडी पाने के लिए महिला ने Guardians and Wards Act, 1890 (अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम) की धारा 7 और 25 के तहत आगरा की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की।

दादी ने बच्चे के बयान और वसीयत का दिया हवाला

दादी ने अदालत में दलील दी कि मां ने बच्चे को छोड़ दिया था और वह लंबे समय से उनकी देखभाल में रह रहा है। उन्होंने मुकदमे के दौरान दर्ज बच्चे के बयान, कथित समझौते और पिता की वसीयत का हवाला देते हुए कस्टडी अपने पास रखने की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि छह साल के बच्चे के बयान को निर्णायक नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जब बच्चे को मां से दूर रखा गया हो, तो उसे सिखाकर बयान दिलाए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

मां प्राकृतिक अभिभावक, बच्चे का कल्याण सर्वोपरि

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Githa Hariharan बनाम Reserve Bank of India का उल्लेख करते हुए कहा कि पिता की मृत्यु के बाद मां बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है। किसी समझौते या वसीयत के आधार पर बच्चे के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मां की अपील स्वीकार कर ली और बच्चे की कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया। साथ ही, बच्चे और दादी के संबंध बनाए रखने के लिए दादी को मुलाकात का अधिकार भी दिया। अदालत के इस फैसले में स्पष्ट किया गया कि कम उम्र के बच्चे की इच्छा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका समग्र कल्याण, भावनात्मक जरूरतें और मां के साथ उसका संबंध है।