law-order
POCSO मामले में आरोपियों को जमानत देने वाले जज पर कार्रवाई रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- चेतावनी काफी थी
राजस्थान के धौलपुर स्थित POCSO कोर्ट के विशेष न्यायाधीश मुकेश त्यागी ने हाईकोर्ट से जमानत खारिज होने के बावजूद दो आरोपियों को बेल दी थी, जिसके बाद उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू हुई। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा कि मामले में विभागीय जांच के बजाय चेतावनी देना पर्याप्त होता।

यह मामला राजस्थान के धौलपुर में POCSO एक्ट (बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण देने वाला कानून) के तहत विशेष न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहे मुकेश त्यागी से जुड़ा है। मई 2019 में उन्होंने दो आरोपियों को जमानत दे दी थी। इससे पहले आरोपियों की जमानत याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट खारिज कर चुका था। हाईकोर्ट ने बाद में आरोपियों को दी गई जमानत रद्द कर दी। हाईकोर्ट की ओर से इस आदेश को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिए जाने के बाद मुकेश त्यागी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू हुई। उन पर राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 16 के तहत गंभीर न्यायिक अनुचित आचरण और अनुशासनहीनता के आरोप लगाए गए। इसके बाद संबंधित अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की टिप्पणियों में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, लेकिन अनुशासनात्मक जांच को उचित नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जांच शुरू करने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं थी। अदालत के अनुसार, हाईकोर्ट के न्यायाधीश की टिप्पणियों को अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में दर्ज करना पर्याप्त हो सकता था। अधिकारी को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने और उसी मामले में हाईकोर्ट द्वारा पहले दिए गए आदेशों को उचित महत्व देने के लिए समझाया या चेतावनी दी जा सकती थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में जारी आरोप-पत्र और अनुशासनात्मक ज्ञापन आवश्यक नहीं थे। इसके आधार पर अदालत ने 25 अक्टूबर 2024 के अनुशासनात्मक ज्ञापन और उससे संबंधित आरोपों को रद्द कर दिया।
रिटायरमेंट के बाद भी नहीं मिले थे पूरे लाभ
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि मुकेश त्यागी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में उनका रिकॉर्ड सकारात्मक था। वह 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त हो चुके थे, लेकिन उनका संशोधित वेतन और सेवानिवृत्ति से जुड़े लाभ जारी नहीं किए गए थे। अदालत ने राजस्थान सरकार और राजस्थान हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि अधिकारी के वेतन की संशोधित वेतनमान के अनुसार दोबारा गणना की जाए तथा पेंशन, बकाया राशि और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ तीन महीने के भीतर जारी किए जाएं। यह निर्देश किसी अन्य कानूनी बाधा के न होने की शर्त के अधीन है।
फैसले का क्या है महत्व?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला इस मामले की विशेष परिस्थितियों तक सीमित है। इसे ऐसा सामान्य नियम नहीं माना जा सकता कि किसी न्यायिक अधिकारी के गलत आदेश पर कभी अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती। इस मामले में अदालत ने हाईकोर्ट की ओर से जमानत आदेश पर की गई टिप्पणियों को बरकरार रखते हुए अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही को रद्द किया। इस तरह न्यायिक आदेश की आलोचना और न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के बीच अंतर स्पष्ट किया गया।
मामले का नाम: मुकेश त्यागी बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य।
पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय।
