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अदालत में AI से तैयार फर्जी फैसले पेश करने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वकीलों के आचरण पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से तैयार ऐसे कथित फर्जी न्यायिक फैसलों का संकलन पेश किए जाने का मामला सामने आया, जिनके अस्तित्व पर ही सवाल उठे। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस घटना को अवांछनीय बताते हुए वकीलों के आचरण पर चिंता जताई। हालांकि, अदालत ने दिवालिया कार्यवाही को चुनौती देने वाली दो कंपनियों की अपील खारिज कर दी।

Sonali16 अक्टू. 2026, 03:48 PM IST
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अदालत में AI से तैयार फर्जी फैसले पेश करने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वकीलों के आचरण पर टिप्पणी

नई दिल्ली:

 सुप्रीम कोर्ट ने अदालत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए कथित फर्जी न्यायिक फैसले पेश किए जाने पर गंभीर चिंता जताई है। यह मामला दो कंपनियों की ओर से दाखिल अपीलों की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिनमें दिवालिया कार्यवाही शुरू करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि अपीलकर्ताओं की ओर से पेश मामलों के संकलन में ऐसे फैसले शामिल होने की शिकायत की गई, जिनका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं था। अदालत ने इसे अवांछनीय घटना बताते हुए संबंधित वकीलों के आचरण पर चिंता जताई। 

अदालत में पेश किए गए फैसलों पर आपत्ति

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने अपीलकर्ताओं की ओर से पेश न्यायिक फैसलों के संकलन पर तत्काल आपत्ति उठाई। उनका आरोप था कि उसमें ऐसे फैसले शामिल थे, जो वास्तविक नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज किया कि अदालत के सवाल पूछने पर अपीलकर्ताओं के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड ने पूरी जिम्मेदारी अपीलकर्ताओं पर डालने की कोशिश की और संकलन में शामिल सामग्री की जानकारी न होने की बात कही। इसके बाद अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने घटना की जिम्मेदारी स्वीकार की और माफी मांगी। अदालत ने शुरुआत में उदाहरण पेश करने के लिए भारी जुर्माना लगाने पर विचार किया था। हालांकि, पहली अपीलकर्ता कंपनी की मृत्यु संबंधी सूचना मिलने के बाद प्रस्तावित जुर्माना हटा दिया गया। अंततः अदालत ने लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।

दो कंपनियों की दिवालिया कार्यवाही को चुनौती

यह मामला GSTAAD Hotels Pvt. Ltd. और Neo Capricorn Plaza Pvt. Ltd. से जुड़ा है। दोनों कंपनियों ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) द्वारा दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने भी NCLT के आदेश को बरकरार रखा था। कंपनियों की अपील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC), 2016 के तहत दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक शर्तों की व्याख्या की। 

कर्ज की पूरी राशि तय करना शुरुआती चरण में जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के शुरुआती चरण में वित्तीय कर्ज और भुगतान में चूक (डिफॉल्ट) का प्रथम दृष्टया प्रमाण जरूरी है। इस स्तर पर कर्ज की अंतिम और सटीक राशि का विस्तृत हिसाब तय करना आवश्यक नहीं है। पीठ ने कहा कि ब्याज, दंडात्मक शुल्क या खातों के मिलान को लेकर विवाद होने मात्र से पहले से स्थापित डिफॉल्ट समाप्त नहीं हो जाता। हालांकि, दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए IBC की धारा 4 के तहत निर्धारित वैधानिक सीमा पूरी होनी चाहिए। अदालत ने यह भी समझाया कि प्रक्रिया के शुरुआती चरण में चूक का संक्षिप्त आकलन किया जाता है, जबकि दावों की विस्तृत जांच और उनकी वास्तविक राशि का निर्धारण कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) के दौरान होता है। पीठ ने सूचना उपयोगिता (Information Utility) द्वारा जारी प्रमाणित डिफॉल्ट रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया। ऐसे रिकॉर्ड को प्रथम दृष्टया पर्याप्त माना जा सकता है, जब तक उसके विरुद्ध स्पष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य पेश न किए जाएं। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर कथित फर्जी न्यायिक फैसलों को अदालत में पेश किए जाने पर चिंता जताई, वहीं दूसरी ओर स्पष्ट किया कि दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के चरण में डिफॉल्ट का प्रमाण महत्वपूर्ण है, न कि कर्ज की अंतिम राशि पर हर विवाद का निपटारा।