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तलाक के 16 साल बाद घरेलू हिंसा केस में कल्याण कोर्ट का आदेश, पूर्व पति देगा ₹4,000 मासिक भरण-पोषण

तलाक के 16 साल बाद घरेलू हिंसा मामले में कल्याण कोर्ट ने महिला के पक्ष में आदेश दिया है। अदालत ने पूर्व पति को हर महीने ₹4,000 भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च के ₹3,000 देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने पति और उसकी एक बहन के खिलाफ घरेलू हिंसा साबित मानी, जबकि ₹25 लाख मुआवजे की मांग खारिज कर दी।

Sonali16 अक्टू. 2026, 03:49 PM IST
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तलाक के 16 साल बाद घरेलू हिंसा केस में कल्याण कोर्ट का आदेश, पूर्व पति देगा ₹4,000 मासिक भरण-पोषण

कल्याण की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अदालत ने घरेलू हिंसा के मामले में तलाकशुदा महिला को हर महीने 4,000 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया है। अदालत ने पति और उसकी एक बहन के खिलाफ घरेलू हिंसा साबित मानी। साथ ही, महिला को मुकदमे के खर्च के रूप में 3,000 रुपये देने का निर्देश भी दिया। हालांकि, स्त्रीधन लौटाने और 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग अदालत ने खारिज कर दी। यह फैसला 5 अक्टूबर 2026 को न्यायिक मजिस्ट्रेट निलेश प्रभाकर वासडे ने सुनाया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला सुमेधा किरण मुजुमदार और उनके पति किरण मंगेश मुजुमदार से जुड़ा है। दोनों की शादी 4 मई 2001 को गुजरात में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। सुमेधा के मुताबिक, शादी के बाद उन्हें पति और ससुराल के अन्य सदस्यों की ओर से कथित तौर पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। महिला ने अदालत में आरोप लगाया कि शादी के करीब 15 दिन बाद उनसे मंगलवाड़ी के आयोजन के लिए 7,301 रुपये और मंगला गौरी के त्योहार के लिए 12,000 रुपये की मांग की गई। बाद में उनसे पांच लाख रुपये लाने को भी कहा गया। महिला के अनुसार, जब उन्होंने कथित उत्पीड़न के बारे में पति को बताया तो उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ससुराल में उन्हें अपने परिवार से फोन पर बात करने से रोका जाता था। महिला ने बताया कि 15 अगस्त 2001 को उन्हें पिता के साथ मायके जाने के लिए कहा गया। उस समय वह गर्भवती थीं। कुछ दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और अस्पताल में उपचार कराना पड़ा। उन्होंने गर्भपात के लिए ससुराल वालों को जिम्मेदार ठहराया, जबकि प्रतिवादियों ने इस आरोप से इनकार किया।

2010 में हुआ था तलाक

सुमेधा ने वर्ष 2008 में कल्याण की सिविल अदालत में तलाक की याचिका दायर की थी। उन्हें 6 फरवरी 2010 को एकतरफा तलाक की डिक्री मिली थी। इसके बावजूद उन्होंने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत वर्ष 2017 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। महिला ने खुद को बेरोजगार बताते हुए पति से हर महीने 25,000 रुपये भरण-पोषण, अपना स्त्रीधन वापस दिलाने और मानसिक प्रताड़ना के लिए 25 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी।

पति ने आरोपों से किया इनकार

पति और अन्य प्रतिवादियों ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि महिला को उसका स्त्रीधन पहले ही वापस दिया जा चुका है। उन्होंने यह भी दलील दी कि तलाक हो जाने के बाद महिला पति से भरण-पोषण मांगने की हकदार नहीं है। पति ने अपनी बेरोजगारी का हवाला देते हुए भरण-पोषण देने में असमर्थता जताई। हालांकि, सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने अपना साक्ष्य पेश नहीं किया और महिला की गवाही का जिरह के जरिए खंडन भी नहीं किया। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत तलाकशुदा महिला भी राहत मांग सकती है, यदि वह पहले घरेलू संबंध में रही हो और घरेलू हिंसा का आरोप लगाती हो।

पति और उसकी बहन के खिलाफ घरेलू हिंसा साबित

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि महिला ने पति और उसकी एक बहन के खिलाफ घरेलू हिंसा के आरोप साबित किए हैं। हालांकि, अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ पर्याप्त विशिष्ट साक्ष्य नहीं मिले। महिला की एक अन्य ननद की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो चुकी थी। भरण-पोषण की राशि तय करते समय अदालत ने माना कि पति की आय के संबंध में दोनों पक्षों ने ठोस दस्तावेज पेश नहीं किए। फिर भी, पति का अपनी पत्नी के भरण-पोषण के प्रति कानूनी और नैतिक दायित्व है। रोजमर्रा के खर्चों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पति को फैसले की तारीख यानी 5 अक्टूबर 2026 से हर महीने 4,000 रुपये देने का आदेश दिया।

स्त्रीधन और 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग खारिज

अदालत ने स्त्रीधन लौटाने की मांग इसलिए खारिज कर दी, क्योंकि महिला यह साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सकीं कि उनके गहने और अन्य सामान पति के कब्जे में हैं। इसी तरह, मानसिक प्रताड़ना के लिए मांगे गए 25 लाख रुपये के मुआवजे के संबंध में भी नुकसान और राशि के आधार को साबित करने वाले पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। अंतिम आदेश में अदालत ने आवेदन आंशिक रूप से मंजूर करते हुए पति को हर महीने 4,000 रुपये भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च के लिए 3,000 रुपये देने का निर्देश दिया। आदेश की प्रति संबंधित संरक्षण अधिकारी और पुलिस थाने को भेजने का भी निर्देश दिया गया, ताकि आदेश के क्रियान्वयन में महिला को आवश्यक सहायता मिल सके।