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सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी फुटपाथ से अतिक्रमण नहीं हटा तो धरने पर बैठेंगे जज!

दिल्ली में पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित फुटपाथ और सड़क पार करने की व्यवस्था नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। अदालत ने 25 नवंबर 2026 तक ठोस कार्रवाई नहीं होने पर दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर धरने पर बैठने की चेतावनी दी है। कोर्ट ने फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने, सुरक्षित क्रॉसिंग बनाने और पैदल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

Kashish Rai17 अक्टू. 2026, 05:36 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी फुटपाथ से अतिक्रमण नहीं हटा तो धरने पर बैठेंगे जज!

दिल्ली में पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित फुटपाथ और सड़क पार करने की व्यवस्था की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के आसपास की स्थिति पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार और संबंधित प्रशासन को जल्द ठोस कदम उठाने की चेतावनी दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यदि 25 नवंबर 2026 तक समस्या के समाधान के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो पीठ के जज दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर धरने पर बैठ सकते हैं। अदालत ने साफ किया कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और प्रशासन को केवल आश्वासन देने के बजाय जमीन पर काम करके दिखाना होगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि केवल कमेटियां बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। फुटपाथों को अतिक्रमण से मुक्त करना और पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराना जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि तय समय में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने के लिए बुलाया जा सकता है।


सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने वालों की सुरक्षा को नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया है। संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार तथा अनुच्छेद 19(1)(d) में देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार दिया गया है। फुटपाथों की कमी, उन पर अतिक्रमण और सुरक्षित क्रॉसिंग नहीं होने के कारण लोगों को मुख्य सड़क पर चलना पड़ता है। इससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। अदालत का जोर इस बात पर है कि प्रशासन लोगों को सुरक्षित पैदल आवागमन के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराए। अदालत ने सड़क निर्माण और शहरी नियोजन में पैदल यात्रियों की जरूरतों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक, सड़कों के किनारे सुरक्षित, अतिक्रमण-मुक्त और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथ उपलब्ध कराने की व्यवस्था जरूरी है। सड़क बनाने वाली एजेंसियों और स्थानीय निकायों को फुटपाथ के निर्माण के साथ उसके रखरखाव पर भी ध्यान देना होगा। फुटपाथों को केवल वैकल्पिक सुविधा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथों पर रेहड़ी-पटरी, अवैध पार्किंग, कचरे और दूसरी बाधाओं के कारण पैदल यात्रियों को होने वाली परेशानी पर भी ध्यान दिया है। अदालत का जोर फुटपाथों को बाधा-मुक्त बनाने और उनकी नियमित निगरानी करने पर है। इसके साथ ही प्रमुख शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर फुटपाथों तथा सड़क पार करने की जगहों का सुरक्षा ऑडिट कराने की जरूरत बताई गई है, ताकि खराब फुटपाथों, अतिक्रमण और असुरक्षित क्रॉसिंग की पहचान कर समय पर सुधार किया जा सके। अदालत ने फुटपाथों के निर्माण और उनकी स्थिति की निगरानी के लिए केंद्र सरकार से केंद्रीय अथॉरिटी गठित करने या किसी मौजूदा संस्था को यह जिम्मेदारी सौंपने के मुद्दे पर भी निर्देश दिए हैं। इसके अलावा, शुरुआती चरण में पांच शहरों में फुटपाथ निर्माण से जुड़ा पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ते विकसित करना और फुटपाथ निर्माण तथा रखरखाव के मानकों को बेहतर बनाना है।


सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथों के डिजाइन और निर्माण में इंडियन रोड्स कांग्रेस (IRC) के दिशा-निर्देशों का पालन करने पर जोर दिया है। IRC 103:2022 में पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ की योजना और डिजाइन से जुड़े मानक दिए गए हैं। इनमें सुरक्षित सतह, बाधा-मुक्त रास्ते और दिव्यांगों के लिए रैंप जैसी सुविधाएं महत्वपूर्ण हैं। इन व्यवस्थाओं से बच्चों, बुजुर्गों और व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी सुरक्षित आवागमन में मदद मिल सकती है। अदालत ने फुटपाथों पर अतिक्रमण और खराब व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों के समाधान पर भी जोर दिया है। ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली के माध्यम से लोग फुटपाथों की खराब स्थिति, अवैध कब्जे और असुरक्षित क्रॉसिंग की जानकारी प्रशासन तक पहुंचा सकते हैं। ऐसी व्यवस्था से समस्याओं की पहचान और समयबद्ध कार्रवाई में मदद मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि शहरों का विकास केवल गाड़ियों की आवाजाही को ध्यान में रखकर नहीं किया जा सकता। पैदल यात्रियों को भी सुरक्षित और सुविधाजनक रास्ते उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है।