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डोंबिवली के कथित बाघ शिकार मामले में 23 साल बाद फैसला, सबूतों के अभाव में तीन आरोपी बरी

डोंबिवली पूर्व में बाघ की खाल मिलने के करीब 23 साल पुराने मामले में कल्याण कोर्ट ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। 7 अक्टूबर 2026 को न्यायाधीश निलेश प्रभाकर वासडे ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष न तो बाघ की खाल की बरामदगी को कानूनी रूप से साबित कर सका और न ही अवैध हथियार रखने के आरोपों के पर्याप्त सबूत पेश कर पाया।

Sonali17 अक्टू. 2026, 05:36 PM IST
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डोंबिवली के कथित बाघ शिकार मामले में 23 साल बाद फैसला, सबूतों के अभाव में तीन आरोपी बरी

कल्याण:

मामला मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर क्रमांक II-19/2003 से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 18 अप्रैल 2003 को पुलिस उपनिरीक्षक चनाबसप्पा सिद्धप्पा माली को गुप्त सूचना मिली थी कि कैलास बालकृष्ण पाटील और संतोष पंडित पाटील के पास बाघ की खाल है। सूचना के आधार पर पुलिस टीम और पंच गवाहों ने डोंबिवली पूर्व के हेदुताने गांव में बदलाापुर पाइपलाइन रोड पर समाधान होटल के पास कार्रवाई की। पुलिस ने दोनों आरोपियों को हिरासत में लिया। तलाशी के दौरान कैलास पाटील के पास से बाघ की खाल मिलने का दावा किया गया, जबकि संतोष पाटील के पास से कुछ बरामद नहीं हुआ। पुलिस ने खाल जब्त कर पंचनामा तैयार किया। जांच के दौरान पुलिस ने आरोप लगाया कि खाल बिक्री के लिए लाई गई थी और अन्य आरोपियों ने बाघ को मारकर उसकी खाल, नाखून और दांत निकाले थे।

पंच गवाह और शिकायतकर्ता की गवाही नहीं हुई

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष पंच गवाहों और उस पुलिस अधिकारी को पेश करने में विफल रहा, जिसने कथित बरामदगी और जब्ती की कार्रवाई की थी। परिणामस्वरूप, जब्ती पंचनामा विधिवत साबित नहीं हो सका। अभियोजन पक्ष की ओर से केवल एक गवाह की गवाही दर्ज की गई। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित नहीं हुआ कि बरामद खाल बाघ की ही थी या आरोपियों ने बाघ का शिकार किया था। अन्य आरोपियों की कथित भूमिका भी प्रमाणित नहीं हो सकी।

वन्यजीव कानून के तहत शिकायत की प्रक्रिया पर सवाल

अदालत ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 55 का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत अधिनियम के अपराधों का संज्ञान लेने के लिए निर्धारित प्राधिकारी की शिकायत या कानून में निर्धारित अन्य वैध प्रक्रिया आवश्यक है। अदालत के अनुसार, मामले में सक्षम प्राधिकारी की आवश्यक शिकायत प्रस्तुत नहीं की गई थी और पुलिस की कार्रवाई वैध अधिकार के अभाव में की गई थी।

हथियार रखने का आरोप भी साबित नहीं

आरोपियों के खिलाफ आर्म्स एक्ट की धारा 3 और 25(1)(a) के तहत बिना वैध लाइसेंस हथियार रखने का आरोप भी लगाया गया था। अदालत ने पाया कि कथित हथियारों की जब्ती साबित नहीं हुई। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष आवश्यक सरकारी मंजूरी (Sanction) भी साबित नहीं कर सका। इस कारण हथियार रखने का आरोप भी टिक नहीं पाया।

अदालत का अंतिम आदेश

न्यायालय ने कैलास बालकृष्ण पाटील, संतोष पंडित पाटील और शरद मारुति श्रीखंडे को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम तथा आर्म्स एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया। अन्य तीन आरोपियों के संबंध में आदेश में उन्हें फरार बताया गया था और अंतिम आदेश में उनके डिस्चार्ज का उल्लेख है। एक आरोपी की मृत्यु के कारण उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त की गई थी। अदालत ने जब्त बाघ की खाल को संबंधित वन विभाग को सौंपकर कानून के अनुसार निपटाने का निर्देश दिया।