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चुनावी हलफनामे में झूठ पकड़ा तो आम नागरिक भी कर सकता है केस, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या तथ्य छिपाने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ आम नागरिक भी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए चुनाव आयोग या सरकारी अधिकारी की शिकायत अनिवार्य नहीं है।

नई दिल्ली:
चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने पर अब आम नागरिक भी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125A के तहत ऐसे मामलों में शिकायत करने के लिए चुनाव आयोग या संबंधित सरकारी अधिकारी का ही शिकायतकर्ता होना जरूरी नहीं है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने यह फैसला सुनाया।
धारा 125A के तहत निजी शिकायत पर रोक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 195(1) में लगाए गए प्रतिबंध जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125A के अपराधों पर लागू नहीं होते। धारा 195(1) कुछ विशेष अपराधों में अदालत द्वारा संज्ञान लेने के लिए संबंधित लोक सेवक या निर्धारित प्राधिकारी की शिकायत की शर्त रखती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 195(1) में धारा 125A को शामिल नहीं किया गया है। इसलिए इस प्रावधान के तहत चुनावी हलफनामे में जानबूझकर गलत जानकारी देने या जानकारी छिपाने के आरोप पर कोई निजी व्यक्ति भी शिकायत कर सकता है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में विधायी इतिहास का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि धारा 125A को वर्ष 2002 में शामिल किया गया था, जबकि CrPC की धारा 195 में संशोधन वर्ष 2006 में हुआ। इसके बावजूद धारा 125A को उन अपराधों की सूची में शामिल नहीं किया गया, जिन पर धारा 195(1) के तहत प्रतिबंध लागू होता है। अदालत के अनुसार, इस चूक को विधायिका की सोच-समझकर की गई व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।
कर्नाटक के विधायक के चुनावी हलफनामे से जुड़ा मामला
यह मामला राजकुमार मडकी की अपील से संबंधित था। उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें विधायक डॉ. शैलेंद्र बेलदाले के खिलाफ उनकी आपराधिक शिकायत रद्द कर दी गई थी। बेलदाले वर्ष 2023 में कर्नाटक की बीदर विधानसभा सीट से निर्वाचित हुए थे। मडकी ने आरोप लगाया था कि बेलदाले ने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में अपने आवासीय पते के संबंध में गलत घोषणा की थी। इस मामले में उन्होंने बेंगलुरु के अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट के समक्ष CrPC की धारा 200 के तहत शिकायत दाखिल की थी। शिकायत में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125A के तहत अपराध का आरोप लगाया गया था। हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना था कि शिकायत पर धारा 195(1) के प्रतिबंध लागू होते हैं और कार्रवाई शुरू करने के लिए निर्वाचन आयोग या संबंधित लोक सेवक की शिकायत आवश्यक है।
चुनाव आयोग के दिशानिर्देश अदालतों पर बाध्यकारी नहीं
सुप्रीम कोर्ट में विधायक की ओर से दलील दी गई कि निजी शिकायतों की अनुमति देने से निर्वाचित उम्मीदवारों के खिलाफ बेबुनियाद आपराधिक मुकदमे बढ़ सकते हैं। इस संदर्भ में जून 2020 के चुनाव आयोग के एक प्रेस नोट का भी हवाला दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि कानून की व्याख्या करना मुख्य रूप से अदालतों का काम है और चुनाव आयोग के दिशानिर्देश या प्रेस नोट वैधानिक प्रावधानों की न्यायिक व्याख्या को बाध्य नहीं कर सकते। इस फैसले से स्पष्ट होता है कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी या तथ्यों को छिपाने के आरोपों पर शिकायत करने का रास्ता केवल सरकारी अधिकारियों तक सीमित नहीं है। हालांकि, शिकायत दर्ज होना अपने आप में उम्मीदवार का दोष साबित होना नहीं है; आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उनका निर्धारण किया जाएगा।
