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विधवा पर दूसरे पुरुष से संबंध का आरोप, 25 साल पुराना फैसला हाईकोर्ट ने पलटा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति की मौत के बाद किसी दूसरे पुरुष से कथित अवैध संबंध होने के आरोप मात्र से महिला का विधवा होने का कानूनी दर्जा खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि संतान को नाजायज ठहराने के लिए केवल आरोप या संदेह पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय सबूत जरूरी हैं।

Sonali24 अक्टू. 2026, 02:14 PM IST
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विधवा पर दूसरे पुरुष से संबंध का आरोप, 25 साल पुराना फैसला हाईकोर्ट ने पलटा

यह मामला उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक परिवार में संपत्ति, उत्तराधिकार और पारिवारिक रिश्तों से जुड़े विवाद का है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर 2026 को राजेश्वरी देवी और अन्य की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया और हरिशंकर पांडे का मूल मुकदमा खारिज कर दिया। मामले के अनुसार, श्रीपति पांडे के तीन बेटे थे—राम अवध पांडे, विंध्याचल पांडे और जगत नारायण पांडे। विंध्याचल पांडे की शादी राजेश्वरी देवी से हुई थी। वर्ष 1938 में विंध्याचल पांडे की मृत्यु हो गई थी और उनकी कोई संतान नहीं थी। इसके बाद राम अवध पांडे के बेटे हरिशंकर पांडे ने वर्ष 1988 में दीवानी मुकदमा दायर किया। उन्होंने अदालत से मांग की कि राजेश्वरी देवी को विंध्याचल पांडे की विधवा न माना जाए। साथ ही, उन्होंने शिव सागर और शिव कुमार को राम अवध पांडे का वैध पुत्र और कानूनी वारिस मानने पर भी सवाल उठाया।

दूसरे पुरुष से संबंध का लगाया गया था आरोप

हरिशंकर पांडे का आरोप था कि पति की मृत्यु के बाद राजेश्वरी देवी का राम अवध पांडे के साथ कथित संबंध था और शिव सागर तथा शिव कुमार इसी संबंध से पैदा हुए थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि राजेश्वरी देवी ने बाद में राम अवध पांडे की पत्नी होने का दावा किया और पुनर्विवाह भी किया। वादी का तर्क था कि कथित संबंधों के कारण राजेश्वरी देवी अपने पहले पति की विधवा होने का दर्जा और उससे जुड़े अधिकार खो चुकी थीं। उन्होंने दोनों बेटों की वैधता और संपत्ति में उनके उत्तराधिकार को भी चुनौती दी।

हालांकि, राजेश्वरी देवी ने राम अवध पांडे के साथ कथित संबंध के आरोप से इनकार किया और स्वयं को विंध्याचल पांडे की विधवा बताया। शिव सागर और शिव कुमार ने भी राम अवध पांडे के बेटे और कानूनी वारिस होने का दावा किया।

निचली अदालत ने महिला के खिलाफ दिया था फैसला

बलिया की द्वितीय अपर जिला अदालत ने 2000 में हरिशंकर पांडे के पक्ष में फैसला सुनाया था। निचली अदालत ने 1963 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 488 के तहत भरण-पोषण से जुड़े एक पुराने मामले में दर्ज टिप्पणियों पर काफी हद तक भरोसा किया था। उस पुराने मामले में राम अवध पांडे को अपनी पत्नी मंटू रानी को 15 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। उस कार्यवाही में राजेश्वरी देवी को राम अवध पांडे के साथ रखी गई महिला के रूप में वर्णित किया गया था। निचली अदालत ने इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर राजेश्वरी देवी को विंध्याचल पांडे की विधवा मानने से इनकार किया और दोनों बेटों की वैधता तथा उत्तराधिकार के दावे को भी स्वीकार नहीं किया। इसके खिलाफ राजेश्वरी देवी और अन्य ने 2001 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

न्यायमूर्ति अनिल कुमार-X ने कहा कि जब वादी स्वयं स्वीकार करता है कि राजेश्वरी देवी का विवाह विंध्याचल पांडे से हुआ था और उनकी मृत्यु 1938 में हो गई थी, तो विधवा होने का कानूनी दर्जा स्वतः स्थापित होता है। इसे केवल बाद में किसी दूसरे पुरुष के साथ कथित संबंध के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि किसी महिला पर कथित अवैध संबंध का आरोप लगाना और उस आरोप को कानूनी रूप से साबित करना दो अलग बातें हैं। गंभीर कानूनी परिणाम पैदा करने वाले ऐसे आरोपों के लिए विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। संतानों की वैधता के मुद्दे पर अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 50 और धारा 112 का उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, जहां धारा 112 के तहत वैधता की कानूनी धारणा लागू होती है, वहां केवल मां के कथित संबंधों का आरोप पर्याप्त नहीं है। कानून में निर्धारित शर्तों के अनुसार आवश्यक तथ्यों को साबित करना पड़ता है। इस मामले में वादी और उसके गवाह के बयानों के अलावा कथित संबंध को साबित करने के लिए कोई पर्याप्त स्वतंत्र साक्ष्य या विश्वसनीय परिस्थितिजन्य प्रमाण पेश नहीं किया गया था।

पुराने भरण-पोषण आदेश को निर्णायक सबूत नहीं माना

हाईकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 488 के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही का उद्देश्य त्वरित और संक्षिप्त राहत देना था। ऐसी कार्यवाही में दर्ज टिप्पणियां बाद के दीवानी मुकदमे में किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति, संतान की वैधता या संपत्ति के उत्तराधिकार का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं बन जातीं। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि राजेश्वरी देवी उस पुरानी कार्यवाही में पक्षकार नहीं थीं। इसलिए उस मामले की टिप्पणियों को उनके खिलाफ निर्णायक सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पाया कि हरिशंकर पांडे ने संपत्ति से जुड़ी कथित गलत प्रविष्टियों को चुनौती देने और जरूरी परिणामी राहत मांगने के बजाय केवल कानूनी दर्जे को लेकर घोषणा मांगी थी। अदालत ने इसे विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 34 के प्रावधानों के तहत भी मुकदमे की एक खामी माना।

निचली अदालत का फैसला रद्द, मूल मुकदमा खारिज

इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजेश्वरी देवी और अन्य की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने 2000 में पारित निचली अदालत के फैसले और डिक्री को रद्द करते हुए हरिशंकर पांडे का मूल मुकदमा खारिज कर दिया।इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला का विधवा होने का कानूनी दर्जा केवल सामाजिक धारणाओं या कथित संबंधों के आरोपों से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसी तरह, किसी संतान की वैधता और उत्तराधिकार को चुनौती देने के लिए भी कानून के मुताबिक पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत जरूरी हैं।