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दोबारा जांच किए बिना दवा कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना गलत, सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध रद्द किया
दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने JPEE Drugs कंपनी को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट और एक दवा की आपूर्ति से दो साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन कंपनी को दवाओं के नमूनों की दोबारा जांच कराने का निर्धारित मौका नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रियागत खामी को गंभीर मानते हुए ब्लैकलिस्टिंग और प्रतिबंध के आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी कंपनी के खिलाफ ऐसी दंडात्मक कार्रवाई कानूनन टिक नहीं सकती।

यह मामला मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं की आपूर्ति से जुड़ा है। JPEE Drugs नाम की लाइसेंस प्राप्त दवा कंपनी ने सरकार को एस्कॉर्बिक एसिड (विटामिन-C) और एथाम्बुटोल हाइड्रोक्लोराइड की गोलियां उपलब्ध कराई थीं। सितंबर 2024 में कंपनी को कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) जारी किया गया। प्रयोगशाला की रिपोर्ट में विटामिन-C की तीन खेपों और एथाम्बुटोल हाइड्रोक्लोराइड की एक खेप को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया। ऐसी दवाओं को ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (NSQ) कहा जाता है। कंपनी ने दवाओं की गुणवत्ता में कमी के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। उसका तर्क था कि दवाओं की आपूर्ति के बाद अनुचित भंडारण या रखरखाव के कारण भी उनकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
दोबारा जांच के बिना लगा दिया प्रतिबंध
30 सितंबर 2024 को मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक ने प्रभावित दवाओं की कीमत वसूलने, विटामिन-C की आपूर्ति के संबंध में कंपनी को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट करने और एथाम्बुटोल हाइड्रोक्लोराइड की आपूर्ति से दो साल तक प्रतिबंधित करने के आदेश जारी किए। आदेश में कहा गया था कि कंपनी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद 1 अक्टूबर 2024 को एक अन्य आदेश में कंपनी के अभ्यावेदन पर विचार कर प्रतिबंध संबंधी निर्णय दोहराया गया। कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के लिए सात दिन का समय दिया गया था, लेकिन उसका जवाब आने की प्रतीक्षा किए बिना कार्रवाई कर दी गई। कंपनी ने यह भी कहा कि निविदा की शर्तों के अनुसार, शुरुआती जांच में दवा की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं मिलने पर उसी खेप से दूसरा नमूना लेकर किसी अन्य प्रयोगशाला में जांच कराना जरूरी था।
हाईकोर्ट के निर्देशों का भी पालन नहीं हुआ
कंपनी की याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नए नमूने लेकर 15 दिनों के भीतर केंद्र सरकार की प्रयोगशाला में जांच कराने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने तत्काल प्रतिबंध रद्द करने के बजाय उसे दोबारा जांच के नतीजे पर निर्भर रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निर्धारित अवधि में दोबारा जांच कराने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। इसके कारण कंपनी को प्रयोगशाला की शुरुआती रिपोर्टों को प्रभावी तरीके से चुनौती देने का अवसर नहीं मिल सका।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 6 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में ब्लैकलिस्टिंग और प्रतिबंध के आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित प्रक्रिया में खामी और दोबारा जांच के अवसर से पूरी तरह वंचित किए जाने के कारण ये आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकते। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि दवाओं की गुणवत्ता को लेकर कार्रवाई करते समय भी अधिकारियों को निर्धारित प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई के नियमों का पालन करना होगा। गुणवत्ता संबंधी आरोप गंभीर हो सकते हैं, लेकिन उनके आधार पर दंडात्मक कार्रवाई करते समय कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती।
