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अवैध गिरफ्तारी के लिए 5 लाख का मुआवजा: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के खिलाफ दिए कार्रवाई के निर्देश
अवैध गिरफ्तारी और करीब 26 दिन तक हिरासत में रखे जाने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को पीड़ित व्यक्ति को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने गिरफ्तारी को गैरकानूनी ठहराते हुए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और मामले में मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी कदम उठाने के निर्देश दिए।

फ्लैट के सौदे को लेकर शुरू हुआ था विवाद
यह मामला मुंबई निवासी बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल (Bipin Satish Chandra Agrwal) से जुड़ा है। वह अपनी सास के फ्लैट के पुनर्विकास (Redevelopment) से संबंधित मामले में उनके पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के रूप में काम कर रहे थे। फ्लैट की बिक्री की रकम को लेकर उनका डेवलपर के साथ विवाद हो गया था। याचिका में सामने आए विवरण के अनुसार, अग्रवाल फ्लैट के सौदे के लिए करीब ₹1.64 करोड़ की रकम की मांग कर रहे थे। डेवलपर ने उन्हें ₹2 लाख अग्रिम राशि के रूप में दिए। आरोप है कि रकम स्वीकार करते ही पुलिस डेवलपर के कार्यालय में पहुंच गई और अग्रवाल को हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद डेवलपर की शिकायत पर अग्रवाल के खिलाफ जबरन वसूली (Extortion) का मामला दर्ज किया गया। मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 के तहत दर्ज था, जो जबरन वसूली के अपराध से संबंधित है।
पुलिस की कार्रवाई पर अदालत ने उठाए गंभीर सवाल
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने मामले के रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि पुलिस यह स्पष्ट करने में विफल रही कि अग्रवाल को गिरफ्तार करना क्यों आवश्यक था। अदालत के अनुसार, अग्रवाल डेवलपर के लिए कोई अज्ञात व्यक्ति नहीं थे। वह संबंधित सोसायटी में मौजूद अपनी सास के फ्लैट के मामले में अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में बातचीत कर रहे थे। ऐसे में पुलिस को यह जांचना चाहिए था कि उनके द्वारा स्वीकार की गई रकम किस उद्देश्य से दी गई थी और क्या वह किसी संपत्ति सौदे या अन्य वैध लेन-देन से संबंधित थी। अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस ने मामले की वास्तविक परिस्थितियों की पर्याप्त जांच किए बिना अग्रवाल को जबरन वसूली करने वाला व्यक्ति और हिस्ट्रीशीटर बताने की कोशिश की। पीठ ने पुलिस और डेवलपर के बीच मिलीभगत से अग्रवाल को झूठे मामले में फंसाए जाने की ओर भी संकेत किया।
6 दिन पुलिस और 20 दिन न्यायिक हिरासत में रहे
अदालत के आदेश के अनुसार, अग्रवाल को छह दिन पुलिस हिरासत (Police Custody) और 20 दिन न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में रखा गया था। इस तरह उन्हें कुल 26 दिन हिरासत में रहना पड़ा। पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों का पालन नहीं किया गया। अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41A के तहत निर्धारित प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। यह प्रावधान कुछ परिस्थितियों में गिरफ्तारी के बजाय जांच में शामिल होने के लिए नोटिस देने से संबंधित था। अदालत ने गिरफ्तारी और रिमांड की कार्रवाई को मनमाना, अनुचित और बिना पर्याप्त कानूनी विचार-विमर्श के की गई कार्रवाई माना।
मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी कार्रवाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने केवल पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि अग्रवाल को पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेजने वाले मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की। पीठ के अनुसार, रिमांड बढ़ाते समय आवश्यक कारण दर्ज नहीं किए गए और मामले की स्वतंत्र रूप से पर्याप्त जांच किए बिना हिरासत जारी रखने की अनुमति दी गई। अदालत ने संबंधित मजिस्ट्रेट की भूमिका पर उचित कार्रवाई के लिए अपने प्रशासनिक समिति (Administrative Committee) के समक्ष फैसले की प्रति रखने का निर्देश दिया।
दो सप्ताह में मुआवजा देने का आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को अग्रवाल को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह भुगतान फैसले को आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए जाने के दो सप्ताह के भीतर किया जाना है। अदालत ने राज्य सरकार को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू करने का निर्देश भी दिया, जिसमें तत्काल निलंबन पर विचार करना शामिल है। साथ ही, जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से मुआवजे की आनुपातिक राशि वसूलने पर भी विचार करने को कहा गया। मामला बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य (Bipin Satish Chandra Agrwal vs State of Maharashtra) से संबंधित है। यह रिट याचिका संख्या 4458/2017 थी। इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज होना अपने आप में गिरफ्तारी को उचित नहीं ठहराता। पुलिस को गिरफ्तारी की आवश्यकता और कानूनी प्रक्रिया के पालन को सुनिश्चित करना होगा।
