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पुलिस थानों के CCTV निरीक्षण का आदेश महीनों से लंबित, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समिति को लगाई फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस थानों में CCTV कैमरों की कार्यशीलता की जांच के लिए औचक निरीक्षण संबंधी आदेश को सभी जिला जजों तक पहुंचाने में हुई देरी पर नाराजगी जताई है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने स्पष्ट कहा कि कोई प्रशासनिक समिति न्यायिक आदेश को केवल इसलिए रोककर नहीं रख सकती, क्योंकि उस पर विचार नहीं हो पाया है। कोर्ट ने संबंधित समिति को 19 फरवरी 2026 के आदेश को प्रदेश के सभी जिला जजों तक पहुंचाने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक न्यायिक आदेश को सिर्फ इसलिए लंबित रखा गया, क्योंकि समिति उस पर विचार नहीं कर सकी।” पीठ ने कहा कि यदि समिति को आदेश की कानूनी वैधता पर आपत्ति है, तो वह मामले को लिटिगेशन कमेटी (Litigation Committee) के पास भेज सकती है, ताकि जरूरत पड़ने पर आदेश को चुनौती दी जा सके। हालांकि, समिति चुपचाप बैठकर न्यायिक आदेश को रोक नहीं सकती।
क्या था 19 फरवरी 2026 का आदेश?
हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2026 को निर्देश दिया था कि उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) या संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट (JM) अपने अधिकार क्षेत्र के पुलिस थानों का अदालत के कामकाज के समय के बाद औचक निरीक्षण कर सकते हैं। इसका उद्देश्य पुलिस थानों में लगे CCTV कैमरों की कार्यशीलता की जांच करना था। निरीक्षण से पहले संबंधित जिला जज को सूचना दी जानी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यह निरीक्षण सुप्रीम कोर्ट के परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में दिए गए निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा। इसे न्यायिक अधिकारी के आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा माना जाएगा। आदेश में यह भी कहा गया था कि निरीक्षण के दौरान पुलिस अधिकारी न्यायिक अधिकारियों को पूरा सहयोग देंगे। यदि किसी न्यायिक अधिकारी के काम में बाधा डाली जाती है या उनके प्रति अनादर दिखाया जाता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। हाईकोर्ट ने इस आदेश को प्रदेश के सभी जिला जजों तक पहुंचाने का निर्देश दिया था।
CCTV फुटेज नहीं मिलने पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि 19 फरवरी का आदेश सभी जिला जजों तक नहीं पहुंचा था, क्योंकि संबंधित समिति उसकी मंजूरी पर विचार कर रही थी। इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने पुलिस थाने के CCTV सिस्टम के खराब होने और फुटेज उपलब्ध नहीं होने से जुड़े मामले पर भी सवाल उठाए।
अवैध हिरासत और मुआवजे का मामला भी उठा
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महेंद्र गौर व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में डिवीजन बेंच के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में चार लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के लिए एक थाना प्रभारी (SHO) को जिम्मेदार ठहराया गया था। राज्य सरकार को पीड़ितों को कुल 65,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट के सामने एक अन्य मामला भी आया, जिसमें कथित तौर पर अवैध हिरासत के शिकार व्यक्ति को मुआवजा नहीं मिला। आरोप था कि मुआवजे के लिए ललितपुर के जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास जाने पर पुलिस अधिकारियों ने उसे परेशान किया। हाईकोर्ट ने कहा कि मुआवजे की अर्जी पर जिला मजिस्ट्रेट की ओर से कार्रवाई न करना अदालत की अवमानना के समान हो सकता है। पीठ ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) से यह जानकारी देने को कहा कि पहले दिए गए आदेश के अनुसार दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है या नहीं। रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश की प्रति DGP और ललितपुर के जिला मजिस्ट्रेट को भेजने का निर्देश भी दिया गया।
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी।
मामले का नाम: Sandeep Singh Solanki v. State of U.P. and Another
